मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"

Friday, October 31, 2008

एक कुत्ता मेरी बाइक के समाने फिदायीन हमला कर बैठा

Stray DogImage by Image Search via Google

'दिन वैसे ही ख़राब चल रहा था, उसी में एक कुत्ता मेरी बाइक के समाने फिदायीन हमला कर बैठा, लेकिन मुझे मामूली सी खरोंच आई... चिंता की कोई बात नहीं है.'

ये लो कर लो बात, आख़िर चिंता की कोई बात क्यों नहीं है - उस कुत्ते के बारे में तो कुछ बताया ही नहीं मेरे दोस्त ने जिन्होंने अपनी मेल में हमको इस घटना की जानकारी दी थी. हाँ वैसे हमारे देश में कुत्ते हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग हो गए हैं. बड़ा ही चिंतनशील जीव है कुत्ता. अगर वो कुत्ता पालतू हो तो कह नहीं सकते, उसके तो छततीस पैंतरे होते हैं जी. मैं तो अपने गली और सड़क के कुत्तों की बात कर रहा हूँ.

और अगर आपको हमारे देश के आवारा कुत्तों की काबिलियत पे शक है, तो दोबारा सोचिये. या रहने दीजिये शायद आप समझ नहीं पायेंगे. वो जूनून जो उनके भीतर है, अगर आपने कभी देखा नहीं है तो मैं आपको बताता हूँ. वो उनका सड़क के किनारे दूर से आते किसी स्कूटर का इन्तेजार करना और फिर एकदम सही टाइमिंग सेट कर के एकदम एंगल बना के, रफ़्तार में आ रहे स्कूटर के दोनों पहियों के बीच से सुरक्षित पार कर होते हुए निकल जाना आसान नहीं है गुरु. वाकई कुत्ता बड़ा daring जीव है.

विदेशों में साला कुत्तों को आदमी बना के पालते हैं. मेरे को बताया गया कि वहाँ कभी किसी कुत्ते को नाम ले के मत बुलाना. मैंने कहा - क्या? तो बताया गया कि कुत्ता मत कहना उधर.. लोग लोड ले लेते हैं. मैं जब किसी काम से एक सज्जन के घर गया उधर तो वो अपने कुत्ते के बारे में इतने इमोशनल थे , कि मैं जितनी देर था , बार बार मन में दोहरा रहा था.. कि कहीं गलती से कुत्ता न बोल दूँ.

अब आइये मैं आपको बताता हूँ कि कुत्ते कितने शालीन होते हैं. बस गली हो या पड़ोसी का बालू हो, बस पड़े रहते हैं, कभी मन किया तो भूंक लिए.... दिल तो इनका इतना बड़ा होता है, कि बस कभी हड्डी भी पड़ी है तो हाथ (मेरा मतलब है मुंह ) भी नहीं लगायेंगे. लालची नहीं होते साब, हमारे यहाँ के कुत्ते.. दिन भर किसी भी गली में निकल जाएँ भगवान् की इतनी दया है कि हर गली में इतना खाने को मिल जाता है, कि वो किसी एक घर के मोहताज नहीं होते हैं.

कुछ कुत्ते बहुत इज्जतदार होते हैं, साला बगल के गली के आवारा कुत्ते अगर उनके इलाके की कुतिया पे ग़लत नजर डाले तो बस जान पे खेल जाते हैं. इतना भून्केंगे .. इतना भूकेंगे .. कि पूरा मोहल्ला जाग जाए.. हां जी, यहाँ तक तो ठीक. पर आप पूछेंगे कि वो हर गली का कुत्ता पालतू कुत्ते को देख के क्यों भूंकता है.. ऐसे भून्केंगे मानो आसमान सर पे उठा लेते हैं.... अब सारा सवाल हमसे क्यों पूछ रहे हैं आप... आपको मेरे इंसान होने पे शक है क्या???



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Sunday, October 26, 2008

हम सब इस देश की ट्रेन में सुरक्षित हैं

Indian train and panchayatImage via Wikipedia
'आज वक्त बदल रहा है. एक वो समय था जब हम इतने धूम धाम से दिवाली और ईद मानते थे कि मजा जाया करता था.' गफ्फूर भाई ने जैसे ही ये बात कही मेरा मन हुआ कि मैं ... उन्होंने मेरे दिल की बात कह डाली थी. अब ट्रेन का सफर हो और इस तरह की पंचायत हो, तो लगता नहीं कि ट्रेन में किराया दे के बैठे हैं. शाम के बज रहे थे और ट्रेन अपनी ही धुन में चली जा रही थी. कोई लोड नहीं ले रहा था.

'हिन्दुस्तान में रहने के ये सब अपने ही फायदे हैं. जब विदेश जाइयेगा तब पता चलता है कि क्या सुकून हैं अपने देश में.' - हमारे बगल में बैठे एक नौजवान ने अपने प्रथम उदगार व्यक्त किए.

मैंने कहा - 'सही है गुरु, आख़िर ऐसा कैसे कह सकते हो? वहाँ कभी ट्रेन इतनी लेट से चलती है?'

उसने मेरी बात का जबाब देकर उल्टे एक प्रश्न ही दाग दिया - 'हमारे यहाँ बोलो कभी भी ड्राईवर का ध्यान मोबाइल से एस.एम्.एस. करने से क्या कभी इतना बट सकता है कि ट्रेन का एक्सीडेंट ही करवा दे? नहीं ... अमेरिका में अभी पिछले महीने ही ऐसा एक एक्सीडेंट हुआ है '

लोग बाग़ इस ज्ञान भरे रहस्योद-घाटन से बाग़ - बाग़ हो उठे. साइड-अपर २४ पे बैठे भइया ने पेपर से सर बाहर निकाल कर अपनी मूंछ कुछ इस तरह सहलाई मानों गर्व से कह रहे हों - 'सही हुआ, साले अंग्रेज बेवकूफ ही रहेंगे - उनकी ट्रेन जबकि ऐसी होती है, कि सब कुछ ऑटोमेटिक होता है, फिर भी साले कामचोर जरा सा ध्यान नहीं रख सकते'

'अरे यार उनके देश में तो हर ट्रेन में ऑटोमेटिक दरवाजा खुलता बंद होता है, जैसे अपने इधर मेट्रो ट्रेन में. देखा नहीं था दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे में' - कैसे शाहरुख खान ने काजोल का हाथ पकड़ा था, इससे पहले की दरवाजा बंद हो जाए.' मेरे को लगा कि टिल्लू बेवजह ही इस बात को रोमांटिक मोड़ दे रहा है. तभी इतनी तेजी से झटका लगा और भड़ाक!! से टॉयलेट का बिना कुंडी का दरवाजा दो तीन बार कसमसाती आवाज करता हुआ कराहा. भला हो स्लीपर के दरवाजों का बला के मजबूत लोहों से बनते हैं, आदमी झटके से बाहर फेंका जाए, पर दरवाजे की मजाल जो हिल जाए.

मैंने कहा भाइयों, याद है आपको एक बार एक ट्रेन (मालगाडी) बनारस में खड़ी थी. इंजन चालू था और एक काँवरिया ने उस बिना ड्राईवर की ट्रेन को जो चलाया तो ट्रेन ऐसे सरपट भागी कि बस किसी तरह उसको इलाहबाद में ही रोका जा सका. भले उस बेचारे काँवरिया को जेल हो गई हो - पर उसने ये तो साबित कर दिया कि बिना किसी ट्रेनिंग के भी हम हिन्दुस्तानी लोग ट्रेन चला सकते हैं. और ख़ास बात तो ये कि कुल तीन घंटे का सफर सिर्फ़ डेढ़ घंटे में पूरा हो गया था. पूरा माहौल ऐसा हो रहा था मानो सबने चैन की साँस ली कि चलो हम सब इस देश की ट्रेन में सुरक्षित हैं. थोड़ी बहुत दिक्कतें भी हैं.. पर सब सहमत थे कि अपना देश अपना ही है...


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Sunday, October 12, 2008

मोना के पापा की अनमोल चिट्ठी

LetterImage by Google via Images
"पापा की सीख" से लिया है मैंने ये नीचे लिखा हुआ पत्र. एक एक बात कितनी सच्ची है. मेरा प्रयास है, कि ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़े इसीलिए पुनः पोस्ट किया है इसे. आज के इस आधुनिक युग की आप धापी में, एक बाप का अपनी बेटी के लिए ये अमूल्य संदेश है.

हर बाप का ये सपना होता है, कि वो अपनी बेटी को सही संस्कार दे के ससुराल विदा करे. धन्य है, इस इंटेरनेट युग का कि इसके जरिये समान विचारधाराएँ बह निकली हैं.

सब कहते हैं, कि उनको सब कुछ पता है. पर असल में कितना पता है ये जरूरी नहीं पर ये जरूरी है, कि हम उन शिक्षाओं को कितना अमल कर पाते हैं.

छोटी - छोटी बातें ही धीरे - धीरे बड़ा असर दिखाती हैं.

बहुत ही उत्तम तरीके से कही गई हैं एक - एक बात. हर बात सोलह आने सच. जरूरत है, तो बस इसपे अमल करने की. पिता को साधुवाद और लेखिका को शुक्रिया....

प्रिय मोना,

आज पहली बार तुम्हारे पापा को तुमसे कुछ कहने के लिए कलम का सहारा लेना पड़ रहा है. लेकिन मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि ये सब मैं तुम्हें उस क्षण बता सकूँ जब तुम अपने पापा को छोड़ नए दुनिया मे कदम रख रही होंगी.


  • बिटिया जब आपका विवाह होता हैं तो आप उस पूरे परिवार से जुड़ जाते हो. हमेशा अपने परिवार का मान सम्मान बनाए रखना. मैने और तुम्हारी मम्मी ने हमेशा तुम्हें अपने से बड़े का आदर करना सिखाया है इसे भूलना नही.


  • मै जानता हूँ कि तुम्हें घर के कार्य ठीक से नहीं आते लेकिन धैर्य व लगन से यदि कार्य करने का प्रयास करोंगी तो निश्चित रूप से सभी कार्य कर पाओंगी. तुम्हें कुछ जरूरी बातें बता रहा हूँ जो तुम्हें मदद करेंगी.


  • प्रातः जल्दी उठने की आदत डाले. इससे कार्य करने मे आसानी होती है साथ ही शरीर भी स्वस्थ रहता है.


  • घर के सभी बड़े लोगो को सम्मान दे व कोई भी कार्य करने से पूर्व उनकी अनुमति ले.


  • भोजन मन लगाकर बनाने से उसमें स्वाद आता है कभी भी बेमन या घबराकर भोजन नही बनाओ बल्कि धैर्य से काम लो.


  • यदि तुम्हें कोई कार्य नही आता तो अपने से बड़े से उसके बारे मे जानकारी लो.और उसे करने की कोशिश करो.


  • गुस्सा आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन है. हमेशा ठंडे दिमाग से काम लो. जल्दबाजी मे कोई कार्य न करो.


  • गलतियाँ सभी से होतीं है. कभी भी कोई गलती होने पर तुरंत उसे स्वीकार करो. क्षमा माँगने से कभी परहेज़ न करो.


  • किसी के भी बारे मे कोई भी राय बनाने के पहले स्वयं उसे जाने,परखे तभी कोई राय कायम करे.सुनी हुई बातों पर भरोसा करने के बजाए स्वविवेक से निर्णय ले.


  • सास ससुर की सेवा करें. उन्हें दिल से सम्मान दे. उनकी बातों को नजर अंदाज न करे. न ही उनकी किसी बात को दिल से लगाए.


  • हमेशा अपने पापा के घर से उस घर की तुलना न करो. न ही बखान करो. वहाँ के नियम वहाँ के रिवाज अपनाने का प्रयास करो.


  • किसी भी दोस्त या रिश्तेदार को घर बुलाने के पहले घर के बड़े या पति की आज्ञा ले.


  • विनम्रता धारण करो. संयम से काम लो.कोई भी बिगड़ी बात बनाने का प्रयास करो बिगाड़ने का नही.


  • कोई भी कार्य समय पर पूरा करे. समय का महत्व पहचानो.हर कार्य के लिए निश्चित समय निर्धारित करो व उसे पूर्ण करो.


  • घर के सभी कार्य मे हर सदस्य की मदद करें. जो कार्य न आए उन्हें सीखे.


ऐसी और भी कई छोटी छोटी बातें है जिनका यदी ध्यान रखा जाएँ तो गृहस्थी अच्छी तरह से चलती है. बिटिया अपनी जिम्मेदारियो से मुँह नही फेरना बल्कि उन्हें अच्छी तरह से निभाना. मुझे तुम पर पूरा भरोसा है. मै जानता हूँ कि तुम अपने ससुराल मे भी अपने मम्मी पापा का नाम ऊँचा रखोंगी व हमे कभी तुम्हारी शिकायत नही आएँगी. तुम सदा खुश रहो और अपनी जिम्मेदारियाँ ठीक से निभाओ यही आशीर्वाद देता हूँ.

तुम्हारा पापा

भगत जी - जो अपना है, वो आपको सब मिलेगा

Kabir Wani - At Kabir Wad
Kabir Wani - At Kabir Wad (Photo credit: ajaytao)

राम राम पंचों. आज भगत जी फिर से गाँव में आए हैं. हमेशा की तरह लोगों की भीड़ उनको घेरे हुए है. अन्तिम बार आए थे तो उन्होंने पंचों को ईमानदारी का अनमोल सबक दिया था. ये दो लाइनें कल्लू को अभी तक याद हैं.

हमको बहुत अच्छा लगा कि तुम बहुत ईमानदार हो, जो सबको होना चाहिए. अपनी ईमानदारी ही अध्यात्म और संसार दोनों में ऊंचाई तक ले जाती है. आपमें वो सब गुण है उसको विकसित करने की जरूरत है.

अब भगत जी सभी को समझाते फिर रहे हैं - और उनकी लोकप्रियता खूब बढ़ती जा रही है. लोग उनकी बात को ध्यान से सुनते थे. इस बार भगत जी, शिर्डी वाले साईं बाबा के यहाँ से हो के आए हैं तो कुछ जिज्ञासा ज्यादा है लोगों में. धीरे - धीरे वहाँ और भीड़ इकठ्ठा हो गई. कल्लू ने हमेशा की तरह सारा इन्तजाम किया और भगत जी ये कहते हुए पाये गए.

जब बच्चा छोटा होता है तो उसको बचाया जाता है हर टेंशन से. कि कहीं बच्चे के विकास में कोई रुकावट आए. हर तरह से मजबूत हो जाए. कि संसार की सभी हवाओं को सहने लायक हो जाए क्योंकि हर किसी को अकेले ही इस संसार में हर परिस्थिति का सामना करना पड़ता है. बच्चे को जीना सीखाना पड़ता है कि वो अपने दिमाग और अपने विवेक का इस्तेमाल करना सीख जाए.

ये सब तो अच्छी बात थी. आख़िर कब से ये गाँव पारिवारिक कलह से जूझ रहा था. लोगों में एक दूसरे के कष्टों को देखने की ताकत ही ख़तम हो गई थी. अब कहाँ बच्चे ये सब समझ पाते हैं. बस भगत जी तो चाहते हैं, कि लोग अपनी जिम्मेदारी समझें. पर नहीं. भगत जी अपने में ही मगन हैं. वो तो बस इस आधुनिक युग में भी अपनी बातों के जरिये लोगों तक अपना संदेश पहुँचा देना चाहते हैं.

भगत जी एक दिन बता रहे थे - मजिल तक के रस्ते में बहुत रुकावट आती है उसको पार करना होता है. पार करने में भगवान् की मदद की जरूरत होती है. जब हम उस मालिक के सहारे होते हैं तो सब पार हो जाता है. एक बार की घटना है - एक संत बहुत ऊंचाई से झील में गिर गए, लोग सोचे अब तो वो आदमी मर गया होगा. बहुत खोजा गया - कहीं पता नहीं चला. कुछ दिन के बाद वो किनारे पर आ के लग गए. बाकी देखने वाले बहुत परेशान हुए, आख़िर ऐसा कैसे हो सकता है. लोगों के पूछने पर भगत जी ने लोगों को समझाते हुए बताया.

आदमी को कुछ करना नहीं होता है. पानी जिधर ले गया संत महाराज चले गए. संत इसीलिए सही सलामत रह गए क्योंकि उन्होंने कोई जबरदस्ती नहीं की. अगर उन्होंने जबरदस्ती की होती तो वो यहाँ नहीं होते. तात्पर्य ये है, हर किसी को वो करना होता है जो ऊपर वाला करता है. जब हम उसके बिधान में छेड़छाड़ करते हैं तो ठीक नहीं होता. हर किसी को अपने हिस्से का सब कुछ मिलता है, मांगने की जरूरत नहीं होती है. आप चलते जाओ, जो अपना है, वो आपको सब मिलेगा. इसी का नाम है श्रद्धा और सबुरी. ये बाबा का मंतर है - येही पर लगा देता है.
  • नासमझ लोग ऐसा ही करते हैं, समझने का प्रयास भी नहीं करते। कोई समझाए भी तो उसको बेवकूफ समझते हैं। दुनिया का कोई पागल अपने आपको कभी पागल नहीं मानता। वह उसी को पागल बताता है जो उसे पागलखाने में भर्ती कराने जाता है या इलाज कराने जाता है। बेवकूफ को बेवकूफ कहो तो उसको करंट लगता है परंतु नासमझ कहने से बात उतनी नहीं बिगड़ती, इसलिए हमेशा इस शब्द का ही इस्तेमाल करना चाहिए। बेवकूफ कहने से नामसझ कहना अच्छा है। थोड़ा 'सम्मानजनक' शब्द है।.


  • ऐसा भी नहीं कि ऐसे नासमझों को समझाने में अपनी उर्जा लगाने वाला व्यक्ति समझदार होता है। अपनी उर्जा को व्यर्थ खर्च करने वाले ऐसे लोगों की गिनती भी नासमझों में ही की जाती है। फिर किया क्या जाए, यह एक यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर सहज ढूंढ पाना कठिन है, प्रयास करना चाहिए। आइये आप हम सब इस यक्ष प्रश्न का उपयुक्त उत्तर तलाशने की कोशिश करें।

उपर्युक्त लाइनें श्रीकांत परासर जी के लिखे लेख नासमझ लोग से ली गई हैं
  • मूर्ख व्यक्ति से बहस न करें। पहले तो वे आपको उनके स्तर तक घसीट लाते हैं, फ़िर अपने अनुभव से आपको परास्त कर देते हैं।

Saturday, October 11, 2008

लेकिन हर सही आदमी को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए

English: A "taolènnou" or Breton &qu...
English: A "taolènnou" or Breton "mission painting", used by Mikael an Nobletz in his preachings, at Combrit Sainte-Marine church, with the seven capital sins. (Photo credit: Wikipedia)


भगवन ने सब पापी लोगो को बोनस देकर इस कलयुग में भेजा है, ताकि सब पापी लोगो का कल्याण हो जाए. नियम भी बता दिया है - कुछ नहीं करना है - बस भगवन का प्रेम से नाम लेते रहें और वो आपको भवसागर से पार उतार देगा। जितने अपने पाप की सजा जानवर योनी में भोग रहे थे उन सबको चांस मिल गया. इस मौके को पाकर उसका दुरूपयोग होने लगा. सतयुग में एक रावण था और बस उसका परिवार लेकिन बोनस मिलने के बाद आज के हर घर में आप को रावण मिलेगा और वो सब चीज का दुरूपयोग करने लगा है. सभी नई तकनीक का दुरूपयोग. जैसे ले लो अभी कुछ दिन की बात है वैज्ञानिक लोग ब्रह:मांड का पता लगाने की पूरी कोशिश किये, पर सफल नहीं हो पाये। जरा सोचो, क्या वो ऐसा कर सकते हैं? जो अपनी रक्षा नहीं कर सकता है वो भगवन के रचे संसार का पता कैसे लगा सकता है.

जब हम अपने को नहीं जान पाए, हम कौन हैं? हम कहाँ आए हैं? हमारा काम क्या है? यही नासमझी आज हर घर में है। हम जानवर योनी से आ गए हैं. आज हमारा सब काम जानवर जैसा है इसीलिए हम किसी संत को पहचान ही नहीं सकते हैं. 

और न ही संसार में किसी का कोई गुरु होता है. आज के गुरु भी तो वही है जो जानवर गति से आए हैं. जरा सी ताकत मिल गयी भगवन की तो वो उसका दुरूपयोग शुरू कर दिए. बात तो ये है की किसी चीज का दुरूपयोग नहीं होना चाहिए. जो समझदार बुजुर्ग होते है उनको अपनी चिंता नहीं होती है उनको तो ये लगता है हमने जो किया है उसकी सजा ये है. आगे की जेनरेशन ऐसी है जो आगे बच्चे आने वाले है या इस समय हैं उनका क्या होगा वो बुजुर्ग उनके आने वाले दुःख से दुखी हैं, न की अपने दुःख से.

एक बार की बात है, एक राजा अपनी फूलों की सेज पर सो रहा था. ये सेज बहुत ही सुंदर था. राजा अपनी दासी को सेज देखने को बोल कर चला गया. राजा को आने में देरी हुई तो दासी ने सोचा की हम भी इस सेज पर सो कर देखें कैसा लगता है. इतने में राजा आ गया. रानी को भी बहुत क्रोध आया. अब दासी को सजा सुनाई गई. जितने देर सोई थी उतने १०० कोड़े दासी को मारे जायें. अब दासी को कोड़े मारना शुरू हुआ. दासी का चिल्लाना रोना शुरू हो गया. दासी रोती रही. कुछ देर बाद दासी जोर जोर से हंसने लगी. लोगों को समझ में नहीं आया की मार खाने पर ये हंस क्यों रही है. तब राजा ने दासी से पूछा कि तुम हंस क्यों रही हो. तब दासी ने बोला पहले तो हम अपने कोड़े की चोट से रो रहे थे, पर अब हंस रहे हैं कि हम को कुछ क्षण इस सेज पर सोने की सजा ये है तो राजा तुम तो इसपर कितने समय से सोते रहे हो तुम्हारी सजा क्या होगी. हम इसलिए हंस रहे है।

सबको सजा देने वाला मालिक है और इन्सान के हाथ में कुछ नहीं. सजा तो सबको मिलनी है. वहाँ कोई घूस नहीं चलता है, वहाँ तो बस मोहब्बत ही चलती है वो किसी के पास है ही नहीं . भगवान् ने आपको सुविधा दी हुई है, तो उसका दुरूपयोग नहींकरना चाहिए. हर युग में अच्छे लोग भी होते है लेकिन इस युग में अच्छे लोगो की संख्या बहुत कम है लेकिन हर सही आदमी को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए.

प्रेरणा स्रोत - माँ की शिक्षा जैसी मिली वैसे ही लिख डाली है यहाँ 

Friday, October 10, 2008

हे बुजुर्गों, अपने आप को मत कोसो

मस्त बुजुर्ग लोगImage by Search via Google
"हे बुजुर्गों, अपने आप को मत कोसो. ये मत सोचो की तुमने क्या क्या गर्त में जाते देखा है. मत पछताओ. मजा लो. मजा. अगर तुमको तुम्हारी संतान बहुत कष्ट देती है, तो टेंशन मत लो. मजा लो मजा. तरस खाओ. सोचो ये बच्चे तो अभी बच्चे हैं, और तुम तो निकल जाओगे, पर ये आज की नौजवान पीढी जिस तरह के गड़बड़-झाले में फसी है उसकी कल क्या हालत होने वाली है, तुम सोच भी नहीं सकते."

ऐसा मैं नहीं कहता हूँ कहीं पढ़ा था, कहाँ? याद नहीं.

लेकिन मैं इसका तात्पर्य समझा सकता हूँ. बात ये है, कि इस वक्त की जो पीढी है, बड़ी ही विचित्र स्थिति में है. पिचले १५-२० सालों ने चीजों को इतना कुछ बदल दिया है, कि पूछो मत. अब अपने बाबूजी और उनके बाबू जी के समय के बारे में सोचो. सब कुछ धीरे - धीरे बदलता था. जैसे अगर दादा जी ट्रांजिस्टर सुना करते थे, तो पिता जी लोग रेडियो और स्टीरियो तक ही पहुंचे. फिर जब हमारा जमाना आया तो हमने शुरुवात की ब्लैक एंड व्हाइट टीवी से. फिर अभी न जाने आईपॉड तो और ना जाने कहाँ तक पहुँच गए हैं. और वो भी दिन प्रतिदिन बदल ही रहा है.


दादा जी के समय में इंडिया में कंप्यूटर नहीं था. फिर पिता जी के ज़माने में दिल्ली रेलवे स्टेशन पे कंप्यूटर लगा. हम जब स्कूल गए तो दसवीं में हाथ लगाया पहली बार. अभी के बच्चे लोग - पैदा होते ही लैपटॉप खिलौने की तरह ले के खेलते हैं.

वो जमाना था ट्रांकाल हुआ करता था. फिर पिताजी के पूरे ज़माने में बहुत उन्नति हुई तो टेलीफोन तक बात पहुँची. हमने मोबाइल हाथ लगाया. और अभी छोटे बच्चे पैदा होते ही, पुराने मोबाइल से खेलते हैं, उनको प्लास्टिक का मोबाइल दो, फ़ेंक देंगे.

दादाजी लोग अंगरेजी विदेशी भाषा की तरह सिक्स्थ क्लास से शुरू किए. पिता जी लोग बहुत प्रगति नहीं कर पाये. हम लोग पहली दर्जा से शुरू किए. अभी तो बच्चे प्री - नर्सरी से शुरू कर रहे हैं. फिर भी हमारी हैण्ड राइटिंग और बोलचाल अपने बुजुर्गों से बेहतर नहीं रही.

तो मिला जुला के कहना ये है, कि जिस प्रकार से इतनी तेजी से परिवर्तन हो रहा है हमारे अगल बगल कि हमको आभास ही नहीं हो पा रहा है. हम कहा करते हैं, जेनरेशन गैप के बारे में. पता नहीं हमारे पिता जी और दादा जी के बीच कितना बड़ा गैप था. पर कुछ था. हमारी पिताजी और हमारी बीच उससे कुछ बड़ा गैप था. पर हमारे और हमारी आने वाली पीढी के बीच में कितना बड़ा गैप होगा - शायद मैं तो उसका अंदाजा नहीं लगा सकता हूँ. पर एक बात तो मैं कह सकता हूँ, कि हमारी पीढी तो अपने पिता और दादा की तरह आज भी इस गैप का सामना कर गई. पर जो गैप अभी और आने वाली पीढी में है और आने वाला है, उसका सामना करने के लिए शायद हम तैयार नहीं है.

Tuesday, October 7, 2008

हमारे भाई लोग हमारा लूटा हुआ पैसा वापस ला रहे हैं

DollarImage by S.Das via Google Search
यार, यहाँ आ के लग रहा है, कि लोग इंसान हैं. मैं तो इंसान का मतलब ही भूल गया था.

'ठीक कह रहा है तू.' - फ़ोन के इस तरफ़ मैंने अनमने मन से सहमति जताते हुए कहा. अब दोस्त अमेरिका से फ़ोन कर रहा था. ऐसे ही थोड़े न नहीं कर देता.

मैंने बात आगे बढाते हुए कहा, और मेरे को लगता है, कि सारी दुनिया वाले चप्शण्ड मेहनत सिर्फ़ इसीलिए कर रहे हैं, कि अमेरिकन लोग - समय से ऑफिस से अपना काम पूरा कर के अपने घर समय से पहुँच सकें. उनको दिन में ४८ घंटे बिजली हमेशा मिलती रहे. सड़कें मस्त हों. ट्रैफिक सटासट भागे. और वो अपने सारे शौक़ पूरे कर सकें.

'लाइफ की - एक इंसान के जिंदगी की कितनी वेलू है यार इधर. समझ में नहीं आता है.' - दोस्त ने अपना पक्ष रखा. 'तभी तो सारे चिंतन के विषय इधर आके ही लोगों के दिमाग में आते हैं.'

फिर मेरे को याद आया, कि किस तरह से अंगरेजी सिनेमा में दिखाया जाता है, कि कभी ज्वालमुखी फट गया, तो कभी बरफ और मौसम ऐसा हो गया कि सारी मानव जाति पे संकट मंडराने लगा. और तो और, सारे विदेशी ग्रहों के आक्रमण भी तो यहीं अमेरिका में ही होते हैं. सही है यार, ये दूसरे ग्रह वाले भी सब कुछ जानते हैं.

सारी बातें, मेरे देश के ख़िलाफ़ जा रही थीं, मेरे को कुछ ऐसा नहीं सूझ रहा था. कि मैं क्या कहूं कि बस एक बार में चित्त. बनारस का हो के मैं इस बकर में हारना नहीं चाहता था. बस मैंने शुरू किया. यार अमेरिका में भी लोकतंत्र है, है कि नहीं - 'हाँ' और हमारे देश में भी - है कि नहीं. बोल? 'है' ठीक, तो तुने देखा होगा, अमेरिकन सिनेमा में उनके राष्ट्रपति को हमेशा दिखा दिया जाता है, पर तुने अभी कभी कोई इंडियन सिनेमा में देखा है, कि प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का चेहरा दिखाया जाता है. 'नहीं' आसान जबाब. मैंने आगे समझाते हुए कहा.. यार, बहुत सीधी सी बात है, अपने इधर बहुत खतरा है, तभी तो अगर कहीं सिनेमा में चेहरा दिखा दिया तो बस - अभी जिसके ऊपर ज्यादा खतरा - वो ज्यादा महत्वपूर्ण हुआ कि नहीं?

'यार, इधर ये अमेरिकन लोग - ९११ खूब घुमाते हैं'. - दोस्त ने बात को नया मोड़ देते हुए कहा. मैंने कहा - बस तेरे उधर एक नम्बर है, मेरे इधर १००, १०१, १०३ और न जाने कितने नम्बर हैं. छोड़ यार तू अभी विदेश में है, तो बस इस तरह अपने देश को बदनाम मत कर. उसने पूछा - तुने कभी इनमें से कोई नम्बर मिलाया है? मैंने कहा - काहे को भगवान् न करें.. वैसे अब नम्बर है तो ... मैंने बात वहीँ ख़तम कर दी.

इस बार मैंने बातों की कमान संभाली - सीधा सवाल पूछा. 'उधर, आख़िर कोई संस्कार है' - लोगों में कोई शांती नहीं है? यार तुम देखते हो - वहां कितने तलाक होते हैं. लोगो में कितनी दूरियां हैं. लोग बस भौतिक सुख के पीछे भाग रहे हैं. '

मैं जानता था, 'ये ब्रह्मास्त्र होता है, किसी भी भारतीय का' - उधर थोड़ी देर तक चुप्पी रही. फिर धीरे से आवाज आती है. यार ये संस्कार चलो कहीं और रख के - लोगो के लिए रोटी ले के आते हैं. मैं यहाँ आया हूँ - यहाँ से डॉलर अपने देश में ला के अपने देश को फिर से सोने की चिडिया बनाना है. हमारा देश गरीब है, हमें बहुत काम करना है. एक वक्त था, जब अंग्रेज बाहर से आए थे - तब हम चैन से बैठे थे, और वो सब लूट के चले गए... अब ये हमारा वक्त है, हमने अपने यहाँ के बौधिक संपदा को धीरे - धीरे विदेशों में फैला दिया है. अब ये हमारे भाई लोग हमारा खोया पैसा - लूटा हुआ पैसा वापस ला रहे हैं.

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ये विद्रोह आख़िर है किसके ख़िलाफ़

मैंने बहुत से ब्लॉग पढ़े इधर बीच. ज्यादातर में तमाम तरह की समस्याओं की एक से बढ़कर चर्चा की गई थी. कोई राजनीति तो कोई देश की गरीबी, तो कोई देश की आबादी, और भी जाने क्या क्या. मैं नहीं सोच पाता हूँ इन सब चीज़ों के बारे में ज्यादा. शायद मैं सोचना ही नहीं चाहता हूँ. मैंने समाचारपत्र पढ़ना काफी समय पहले बंद कर दिया. फिर आया न्यूज़ चैनल का जमाना. ऐसी गंध मचाई इन लोगों ने की पूछो मत. मन उचाट हो गया. हर तरफ़ समाचार बेचा जा रहा था. मैं इस समाज में धीरे धीरे outdated होता जा रहा हूँ और मेरे को इसका एहसास भी नहीं हो पा रहा है.

सुन्दरता क्या होती है? मन सुंदर होना चाहिए. कभी भी किसी को बुरा नहीं कहना चाहिए. हमेशा लोगों के बारे में अच्छा सोचो. एक बात और है, जब तक इंसान जिन्दा रहता है, तब तक हम उसकी क़द्र नहीं जानते हैं. ज्यादातर समय हमारा उस कस्तूरी मृग की तरह बीतता है, जिसके बारे में कहा गया हैकस्तूरी कुण्डलि बसै, मृग ढूँढ़त वन माँहि जब तक जो सुख हमारे पास होता है, हम किसी और सुख की तलाश में रहते हैं, फिर कभी भविष्य को सुरक्षित करने में अपने वर्तमान के साथ बड़ा ही सौतेला व्यवाहर करते हैं. अक्सर ऐसा होता है, कि हम कभी अपनी नौकरी, तो कभी पारिवारिक कलह तो कंभी किसी और समस्या में उलझे रहते हैं बस कुछ कुछ चिंता लगी ही रही है. किसी ने सही कहा है, चिंता चिता समान है

सब कुछ जानते हैं, हम लोग. अगर किसी के साथ ये सब बातें करो, तो एक बहुत ही छोटा सा और सीधा सा सपाट जबाब आता है. पर उपदेश कुशल बहुतेरेसही भी है. पर आख़िर हल क्या है. अक्सर जो सत्य एकदम सहज होता है, उसको ही समझने में सबसे ज्यादा टाइम लगता है. किसी से पूछिए आपको वो बतायेगा, कि उसकी जिंदगी सबसे कठिन है. वो सब कुछ सही कर रहा है, पर पता नहीं क्यों उसके साथ एकदम उल्टा हो रहा है. बड़ी नाइंसाफी हो रही है. सब सहमत हैं इस बात से. सबको अपनी कहानी सही लगती है. तो मेरा सवाल ये है, कि अगर सब कुछ ऐसा ही उल्टा हो रहा है, तो भाई इसका हल क्या है. कुछ लोग कहेंगे, इसका कोई हल नहीं है. शायद वास्तव में बहुत से कष्ट होते हैं. जरूर होते होंगे. पर क्या ये सच नहीं है - कि हमें अपना कष्ट तभी तक बड़ा लगता है, जब तक हमको अपने से कहीं ज्यादा दुखी नहीं मिलते हैं, या हमें जब तक इसका एहसास नहीं होता है. ऐसा कोई जिसकी दिक्कतें हमसे ज्यादा बड़ी हैं. और वो हमसे भी ज्यादा दुखी जिंदगी जी रहा है. इस समय दो गाने याद आते हैं

औरों का गम देखा तो, अपना गम भूल गया

राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है, दुःख तो अपना साथी है 
सुख है एक छाँव, आती है जाती है, दुःख तो अपना साथी है.

पर क्या जरूरी है, कि हमको जब दुःख हो तब हमें कोई हमसे ज्यादा दुखी व्यक्ति मिल ही जाए. पर एक चीज तो आप कर ही सकते हैं. आज जो स्थिति में आप है, क्या ऐसा भी हो सकता था, कि इससे भी बुरा हुआ होता. बस एक बार कल्पना कर के देखिये. फिर ठंडे दिमाग से सोचिये. हो सकता है, आपके भाग्य में कुछ और भयानक होना लिखा था, पर इश्वर की कृपा से आज आप कहीं अच्छी हालत में हैं. पर होता क्या हैईश्वर के प्रति शुक्रगुजार होने के बजाय हम लोग एकदम विद्रोही हो जाते हैं. ख़ुद को भी नहीं पता होता है, कि ये विद्रोह आख़िर है किसके ख़िलाफ़. नजरिया बदलिए श्रीमान. किसी को और ख़ास कर अपने आप को माफ़ करना सीखिए. बहुत जरूरी है. वरना समस्याओं की तरफ़ देखेंगे तो बस आप गए. हमेशा दूसरे की जिंदगी दूर से बहुत ही हसीं लगती है. वास्तविकता ये है, कि रोज ऐसे जीइए कि आपको किसी से शिकायत हो. आख़िर जब ऊपर वाले की ही संतान हैं, और अगर सब वही करवा रहा है, तो फिर गम काहे का. बस लगे रहिये. लाइफ इस गुड.


  • लोग 10 सालों की खुशी की तुलना में 10 दिनों के दुःख में ज्यादा सीखते हैं।

  • अगर आप कहीं ग़लत हैं तो इसमें कम-से-कम एक बात अच्छी है - इससे दूसरों को बहुत खुशी मिलती है।

  • दुनिया के आधे लोगों को दुनिया के बाकी लोगों की परवाह नहीं है - इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस तरफ़ हैं।

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