मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"

Sunday, October 5, 2008

भूलना अच्छा है

MemoryImage by Google Image Search via Flickr
बस अब और नहीं बर्दाश्त होता कि कोई कहे की मेरी याददाश्त कमजोर है. अरे यार, ठीक है, पर किसी को पता तो नहीं न चलता है. मैं किसी तरह manage कर ले रहा हूँ न. अपने को दिलासा देने के लिए ये बातें करते - करते कई बार समझ में नहीं आता था. कि क्या करे आदमी. अब सिंकारा पीने से तो याददाश्त वापस नहीं आ जायेगी. भाई, थोड़ा भूल ही तो जाते हैं, कोई एकदम ही थोड़े ही न चली गई है, मूई याददाश्त.
बहुत दिनों तक ये ही चलता रहा - फिर मैंने देखा कि मैं अपने दोस्तों का नाम भूल जाता हूँ, अब वो सेंटी हो जायेंगे. तो भगवान् ने एक जबरदस्त आईडिया सुझा दिया - अहा! अभी मैंने एक कामन नाम रख दिया अपने अगल बगल वालों का. जैसे - जब मैं पढ़ाई कर रहा था.. तो लगा बुलाने लोगों को - 'रमेश' कह के. अब ये निक नेम ऐसा प्रचलित हुआ मेरी मित्र मंडली में, कि न जाने कितने रमेश पैदा हो गए. मेरा काम हो गया.

फिर मैंने - एक और मुज्ला छोडा 'राजू' - अब कई राजू पैदा होने लगे. कि शामत आ गई - सालों ने मेरे को ही राजू कह के बुलाना शुरू कर दिया. चलो फिर काम हो गया. और इतने परिचित और अपरिचित लोगों के नाम को याद रखने से मैं बच गया.

अब आई नौकरी के वक्त की बात. यहाँ तो लोग हिन्दी में बात ही नहीं करते थे.. और मेरे को इलाकाई नाम ज्यादा पता नहीं थी.. कुछ भी रखता, नाम इतने बड़े - बड़े थे कि मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था. तो अब एक और रोचक नाम सूझा. 'बाबूलाल' ये नाम मेरे कुबिकल में इतना चर्चित और प्यार का नाम हो गया, कि अगर कोई भी वहां आ के बाबूलाल कह के संबोधित करेगा, तो एक साथ चार लोग घूम जाते थे - वाह! भाई वाह! एक तीर चार शिकार. मेरा काम आसान हो गया था. भगवान् सभी की मदद करते हैं.

फिर मैंने सोचा कि आख़िर ऐसा क्या है, कि ये याददाश्त का मेरे जीवन में इतना गहरा रिश्ता है. कुछ और सोचा .. फिर कुछ और सोचा तो पता चला की. ये भूलना एक वरदान है. वरना जिदगी आज इतनी आसान न होती. जरूर, हर चीज़ के पीछे कुछ न कुछ अच्छा छिपा होता है.

अगर इंसान सब कुछ याद रखे तो शायद एक क्षण भी जीना मुश्किल हो जायेगा. बहुत चीजें ऐसी होती हैं, जिनको भूल जाना ही अच्छा होता है. और आपकी भूलने की जितनी ही बेहतरीन ताकत होगी, आप उतने ही मस्त जीवन यापन करेंगे. अभी मैं समझ चुका हूँ. चाहे मेरे को जिंदगी में न जाने और कितने ही 'राजू', 'रमेश' और 'बाबूलाल' का सृजन करना पड़े, मैं पीछे नहीं हटूंगा. स्वस्थ जिंदगी के लिए ऐसे सौ नाम कुर्बान. सलाम जिंदगी.

6 comments:

  1. नवरात्रि की कोटि-कोटि शुभकामनाएं। मां दुर्गा आपकी तमाम मनोकामनाएं पूरी करें।
    यूं ही लिखते रहें और दूसरों को भी अपनी प्रतिक्रियाओं से प्रोत्साहित करते रहें, सदियों तक...

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  2. नवरात्रि की कोटि-कोटि शुभकामनाएं।

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  3. अगर भूलने में मजा है तो क्या बात है । नाम भूलों पर काम नहीं ? लिखते रहिये । अच्छा लगा

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  4. अगर भूलने में मजा है तो क्या बात है.....
    नवरात्रि की कोटि-कोटि शुभकामनाएं।

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  5. बढ़िया है..बिना भूले लिखते जाईये नियमित.

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विचारों को पढने और वक्त निकाल के यहाँ कमेन्ट छोड़ने के लिए आपका शुक्रिया

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