मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"

Sunday, October 26, 2008

हम सब इस देश की ट्रेन में सुरक्षित हैं

Indian train and panchayatImage via Wikipedia
'आज वक्त बदल रहा है. एक वो समय था जब हम इतने धूम धाम से दिवाली और ईद मानते थे कि मजा जाया करता था.' गफ्फूर भाई ने जैसे ही ये बात कही मेरा मन हुआ कि मैं ... उन्होंने मेरे दिल की बात कह डाली थी. अब ट्रेन का सफर हो और इस तरह की पंचायत हो, तो लगता नहीं कि ट्रेन में किराया दे के बैठे हैं. शाम के बज रहे थे और ट्रेन अपनी ही धुन में चली जा रही थी. कोई लोड नहीं ले रहा था.

'हिन्दुस्तान में रहने के ये सब अपने ही फायदे हैं. जब विदेश जाइयेगा तब पता चलता है कि क्या सुकून हैं अपने देश में.' - हमारे बगल में बैठे एक नौजवान ने अपने प्रथम उदगार व्यक्त किए.

मैंने कहा - 'सही है गुरु, आख़िर ऐसा कैसे कह सकते हो? वहाँ कभी ट्रेन इतनी लेट से चलती है?'

उसने मेरी बात का जबाब देकर उल्टे एक प्रश्न ही दाग दिया - 'हमारे यहाँ बोलो कभी भी ड्राईवर का ध्यान मोबाइल से एस.एम्.एस. करने से क्या कभी इतना बट सकता है कि ट्रेन का एक्सीडेंट ही करवा दे? नहीं ... अमेरिका में अभी पिछले महीने ही ऐसा एक एक्सीडेंट हुआ है '

लोग बाग़ इस ज्ञान भरे रहस्योद-घाटन से बाग़ - बाग़ हो उठे. साइड-अपर २४ पे बैठे भइया ने पेपर से सर बाहर निकाल कर अपनी मूंछ कुछ इस तरह सहलाई मानों गर्व से कह रहे हों - 'सही हुआ, साले अंग्रेज बेवकूफ ही रहेंगे - उनकी ट्रेन जबकि ऐसी होती है, कि सब कुछ ऑटोमेटिक होता है, फिर भी साले कामचोर जरा सा ध्यान नहीं रख सकते'

'अरे यार उनके देश में तो हर ट्रेन में ऑटोमेटिक दरवाजा खुलता बंद होता है, जैसे अपने इधर मेट्रो ट्रेन में. देखा नहीं था दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे में' - कैसे शाहरुख खान ने काजोल का हाथ पकड़ा था, इससे पहले की दरवाजा बंद हो जाए.' मेरे को लगा कि टिल्लू बेवजह ही इस बात को रोमांटिक मोड़ दे रहा है. तभी इतनी तेजी से झटका लगा और भड़ाक!! से टॉयलेट का बिना कुंडी का दरवाजा दो तीन बार कसमसाती आवाज करता हुआ कराहा. भला हो स्लीपर के दरवाजों का बला के मजबूत लोहों से बनते हैं, आदमी झटके से बाहर फेंका जाए, पर दरवाजे की मजाल जो हिल जाए.

मैंने कहा भाइयों, याद है आपको एक बार एक ट्रेन (मालगाडी) बनारस में खड़ी थी. इंजन चालू था और एक काँवरिया ने उस बिना ड्राईवर की ट्रेन को जो चलाया तो ट्रेन ऐसे सरपट भागी कि बस किसी तरह उसको इलाहबाद में ही रोका जा सका. भले उस बेचारे काँवरिया को जेल हो गई हो - पर उसने ये तो साबित कर दिया कि बिना किसी ट्रेनिंग के भी हम हिन्दुस्तानी लोग ट्रेन चला सकते हैं. और ख़ास बात तो ये कि कुल तीन घंटे का सफर सिर्फ़ डेढ़ घंटे में पूरा हो गया था. पूरा माहौल ऐसा हो रहा था मानो सबने चैन की साँस ली कि चलो हम सब इस देश की ट्रेन में सुरक्षित हैं. थोड़ी बहुत दिक्कतें भी हैं.. पर सब सहमत थे कि अपना देश अपना ही है...


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4 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति | आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुती | दिवाली की शुभकामनाये

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  3. सच है-अपना देश अपना ही है.

    आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

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  4. वाह, ट्रेन देश से अधिक सुरक्षित है!

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विचारों को पढने और वक्त निकाल के यहाँ कमेन्ट छोड़ने के लिए आपका शुक्रिया

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