मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"

Monday, October 6, 2008

कहानी हमारे नंदलाल सर की

Mr. S, Boarding School Teacher
Mr. S, Boarding School Teacher (Photo credit: Tidewater Muse)

एक माट्साब हुआ करते थे, नाम था उनका नंदलाल लाल सर. गुजरे जमाने की बात है, तब मैं छठीं / सातवीं में पढ़ा करता था. बड़ा ही डर लगा रहता था उनसे. रोज सोचता था, कि उनसे पाला न पड़े. पर रास्ता कट ही जाता था. फिर वो उन आतंकियों में से थे, जिन्हें स्कूल बहुत इज्जत से पालता है, क्योंकि वो स्कूल के अनुशासन के एक ऐसे मजबूत स्तम्भ हुआ करते हैं, जिनसे विद्यार्थियों का एक बड़ा तबका हमेशा सहमा रहता है.


अक्सर जो बच्चे हाँथ से निकलते प्रतीत होते थे, उनके माँ - बाप के लिए नंदलाल सर किसी आधुनिक द्रोणाचार्य से कम नहीं थे. नंदलाल सर से टयूशन लगवाओ और सफलता की गारंटी पाओ. मैं हमेशा ऐसे रहा कि - कभी मेरे घर वालों को उनकी सेवा लेने की जरूरत न पड़ जाए. उनका ट्रीटमेंट देने का अपना अनोखा अंदाज था. उनकी क्लास में सबसे ज्यादा शामत उन बच्चों की होती थे, जिन्हें सर जी घर जा के पढाया करते थे. क्लास में उन बच्चों से ज्यादा सवाल पूछे जाते थे. बच्चे हैरान. मास्टर खुश. और बाकी बच्चे भी खुश. क्योंकि, आरती (मास्टर साब का कहर ) भी ज्यादातर उन्ही मासूमों की उतरती थी जो उनसे घर पे पढ़ते थे. बड़ा ग़मगीन नजारा होता था. धूम -धांय - धिशूम - धिसूम -- मास्टर साब पे रंजीत और प्रेम चोपडा की पक्की छाप, ऐसा मैं पूरे विस्वास के साथ कह सकता हूँ.


मैं था एक आम व् साधारण विद्यार्थी, यानी एक बड़े झुंड का हिस्सा जिसमें छिपते-छिपाते आप दर्जे पे दर्जे पास किए जाते हैं, और किसी को पता ही नहीं चलता है. किसी भी स्कूल के किसी भी क्लास का एक बड़ा हिस्सा होने के बावजूद, उनको वो नाम और सम्मान नहीं प्राप्त होता. वो तो बस अति शरारती और कुशाग्र बुद्धि वाले बच्चों के ही हिस्से में आता है. और इनमें भी नाम कमाने के मामले में शरारती गोल कुशाग्र बन्दों से बाजी मार ही जाते हैं.


हाँ, तो मैं बता रहा था, कि आम विद्यार्थी स्कूल में अपनी क्लास में मास्टर की नजरों से बच के चुप चाप बैठता है. किसी को तंग करना, शैतानी करना उसकी फितरत में नहो होता है. शायद ये सब अच्छाइयां मेरे घर वालों को कम लगती थीं. यहीं से शुरू हुआ मेरी शांती में खलल. अरे यार डेली होम वर्क की कॉपी की जांच-पड़ताल. कौन सी कॉपी में साइन है, और कौन सी बिना साइन की. अब मैं छोटा सा बच्चा, कैसे कितनी कहानी सुना के अपने को कब तक बचाता. बस फरमान जारी हो गया. इसको टयूशन की जरूरत है. खोज जारी हो गई. मैं भगवान् से मनाता रहता, कि हे भगवान्, मेरे घरवालों को सदबुद्धी दें. पर नन्हीं सी जान की कौन सुनता है. अब मैं तो सोचता था, कि मैं ऐसे ही मस्त हूँ. पर नहीं, हमारे घरवालों को लगता था, लड़के में संभावनाएं हैं, इसको मौका दिया जाना चाहिए. अरे यार काहे का मौका, अभी घर में कम कुटाई होती है, जो अपने बच्चों को, एक बाहरी से पैसे दे के पिटवाओगे. राम राम. घोर कलजुग. अब बचना मुश्किल था.


तो हुआ यों कि मैं गया परचून की दूकान पे सामान लेने. जी हाँ, पवन जी के यहाँ से वो कुछ घर का सामान लेने गया था. अभी सड़क पार करने ही वाला था, कि मेरे को दिख गई नंदलाल सर की 'प्रिया' स्कूटर. वो पवन जी की दूकान पे थे. मैंने बिना वक्त गवाए वापस लौटना उचित समझा. अपने गुरु को दिया हुआ ये सम्मान मैंने जब आके अपने घर में बताया - तो बस यहीं मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी. घर में लोगों को ये भांपते समय नहीं लगा कि, मेरा ये मेरे गुरु जी के प्रति सम्मान आगे बहुत काम आएगा. बस बातचीत शुरू हो गई. अब ये तय था कि किसी भी तरह से नंदलाल सर को टयूशन के लिए तैयार करना है.


नंदलाल सर, नाटे कद के गोरी चिट्टे सामान्य शरीर के बनावट वाले इंसान थे. जी हाँ, इंसान. अब हर बच्चा उनको इस नजर से न देखे तो इसमें उनका क्या दोष. 'गोल्डी - इधर आओ, अपनी क्लास वर्क की कॉपी ले के आना' - जहाँ ये आवाज गूंजी, सारी क्लास में सांप सूंघ जाया करता था. अब तो गोल्डी भैया गए. अब चाहे कॉपी में काम पूरा हो या न हो - आज तो घन्टी बज गई. क्योंकि जब सर पढाते हैं, तो हर विषय की अपडेट रखते हैं. अब कुछ न कुछ तो बाकी रह ही जायेगा. और गोल्डी भइया पकड़ा गए. 'नहीं सर, नहीं ...... हो जायेगा सर, आगे से नहीं करेंगे.... नहीं सर. ....' पर कहाँ...


वैसे सर हमेशा डंडे या डस्टर से ही नहीं मारते थे. ज्यादातर उनकी दो उंगलियाँ ही उनका हथियार हुआ करती थीं. बात करते करते कमर के ऊपर पेट में जबरदस्त तरीके से उनकी दो उंगलियाँ एक मशीन की तरह चमडी को ऐसा उमेठती थीं, कि नानी न याद जाए तो मेरे ब्लॉग का नाम 'पंचायतनामा' नहीं. और अगर कभी माट्साब डंडा ले के क्लास में घुसे तो समझ लो आज सामूहिक धुलाई का दिन है. बिना भेद-भाव, पूर्ण भाई-चारे के साथ सभी पिटेंगे. माहौल हंसी का तब बन जाता था - जब सर आशीष को बुलाया करते थे.. नाम लेने के साथ ही, हरहरा के टेंसुयें बहना बहाना शुरू कर देता था.. छि... फिर कुछ सूरमा थे, कि सर की तरफ़ इतने धीरे गति से बढ़ते थे, और जैसे जैसे करीब आते थे, क्या आवाज निकालते थे, बिना छुए ही... नहीं सर मर जायेंगे.. माफ़ कर दीजिये...सर नहीईईन ........ पूरा नौटंकी. - पर माट्साब भी कहाँ छोड़ने वाले. अपनी सीट से उठ के सेवा करते थे.


तो जी, नंदलाल सर का पहला दिन था घर पे. मैं और मेरी बहन जो कि उस वक्त मेरे से तीन दर्जे छोटी कक्षा में पढ़ती थी, एकदम तैयार बैठे थे. घर वाले बहुत खुश. वाह! बाहर स्कूटर कि आवाज और दिल की धड़कन तेज. दरवाजा खोला - और मैंने कहा - 'सर नमस्ते' - भड़क गए सर एकदम. 'अपने से बड़े लोगों को नमस्ते करते हैं, यही तरीका है' मैं सर झुका कर सुन रहा था. सॉरी सर. 'ठीक है, आगे से ध्यान रखना - प्रणाम बोला जाता है' - फिर इसी के साथ ये सफर शुरू हुआ. पहले मेरे को भीड़ में से निकाल कर आगे की बेंच पे बैठाया गया. उनके डर से मैं हर सब्जेक्ट का काम एकदम बराबर तैयार रखता था. मास्टर साब को जल्दी ही पता लग गया कि, मैं स्पेशल केस नहीं हूँ, जिसे क्लास में घसीट - घसीट के मारा जाए. बस उनकी शक्ल ही काफी थी. वो भी बड़े खुश. घरवाले भी बड़े खुश, कि वाह! माट्साब ने तो जादू ही कर दिया है. वैसे मुझे तो नहीं याद कि उन्होंने पढाया क्या था. पर उनकी वजह से मैं पढ़ना सीख गया था. अब आगे बैठने से आशीष, सुधीर और कई तेज बच्चों के साथ दोस्ती होने लगी. कापी मिल जाया करती थी और मदद भी.


नंदलाल सर को घरवालों ने बताया - 'सर, ये आपको देख के भाग गया था', अब सर तो खुश हुए ही होंगे अपनी तारीफ सुन के. मैं सिर झुका के सुन रहा था. फिर बात आई, कि कुछ ऐसा किया जाए कि मेरा धड़का खुल जाए. आहा! मेरे को वैसे ही आगे की बेंच पे क्लास में बैठाए जाने के बाद से, मेरे शरीर के कई भाग वैसे ही खुल चुके थे. अब क्या बच्चे की जान ले के ही मानेगे. उसी समय गुरु जी का फरमान जारी हो गया - 'नीरज, तुम प्लेज तैयार करो, मैं तुमको असेम्बली में बुलाऊंगा - तुमको आना होगा और आ के जो प्रतिदिन की प्लेज (शपथ) का प्रोग्राम होता है, उसको तुम्हे करना होगा. यानी, पहली बात, मैं सारी प्लेज याद करून, फिर मंच पे जा के सारे स्कूल को लीड आवाज दूँ. जिंदगी में पहली बार मैंने क्लास १ में प्रयास किया था एक ४ लाइन कि कविता भी नहीं याद हो पाई थी. अन्तिम २ लाइन भूल कर वापस आ गया था. कविता थी.


ट्रिन ट्रिन बोला टेलीफोन
हमें बुलाता इसपर कौन
हैलो मैं हूँ राजू भइया,
मैं दफ्तर से बोल रहा हूँ,
प्यारा मित्र तुम्हारा जोंन

और ये थी स्कूल प्लेज. एक दिन हिन्दी में तो एक दिन अंगरेजी में होती थी.

"India is my country and all Indians are my brothers and sisters. I love my country and I am proud of its rich and varied heritage. I shall always strive to be worthy of it. I shall give respect to my parents, teachers and elders and treat everyone with courtesy. To my country and my people, I pledge my devotion. In their well being and prosperity alone, lies my happiness. Jai Hind!"

"भारत हमारा देश है हम सब भारतवासी भाई बहन हैं हमें अपना देश प्राणों से भी प्यारा है इसकी समृद्धि ओर विविध संस्कृति पर हमें गर्व है हम इसके सुयोग्य अधिकारी बनने का प्रयत्न सदा करते रहेंगे हम अपने माता-पिता, शिक्षकों एवं गुरुजनों का सदा आदर करेंगे और सबके साथ शिष्टता का व्यवहार करेंगे हम वनस्पतियों एवं जीव जंतुओं के प्रति दयावान रहेंगे हम अपने देश, और देशवासियों की प्रति वफादारी करने की प्रतिज्ञा करेंगे उनके कल्याण, और समृद्धि में ही, हमारा सुख निहीत है. जय हिंद! "

मेरी याददास्त शुरू से ही संघर्षशील रही है. और अब तो बड़े होके मैंने अपनी याददाश्त का रास्ता ही निकाल लिया है. लीजिये इसे पढ़ें, भूलना अच्छा है.. मैंने माट साब से दबी जबान में पुछा, 'सर, हिन्दी में या इंगलिश में.?' कड़ा जबाब आया, जो कि अपेक्षित था. 'दोनों में याद कर के रेडी रहो, मैं कभी भी बुला सकता हूँ.' अब अगर उन्होंने ये कहा होता - कि किस दिन बुलाएँगे, तो मैं उसी हिसाब से गणित कर के एक ही किसी भाषा में तैयार रखता. पर अब दोनों में तैयार रखना था - और वो भी जब तक कि माट्साब बुला के संतोष न प्राप्त कर लें, तब तक रोज धुक-धुकि बनी रहती थी. आख़िर एक दिन नम्बर आ ही गया. बकरे की मान कब तक खैर मनाती. बस खुदा का शुक्र था, कि उस दिन जबान नहीं लडखडाई - वरना वहीँ सबके सामने मेरा हैप्पी बड्डे कर देते सर.

अभी हमारी कहानी धीरे धीरे आगे बढ़ ही रही थी. मेरा ही दिल जानता था - कि क्या हो रहा है. तभी, आशीष, जो अब तक मेरा दोस्त हो चुका था, उसने मुझे एक दिन एक आमंत्रण दिया. जब क्लास के अच्छे बच्चे कोई बात करते हैं, तो अच्छी ही होती है. ये निमंत्रण था अभिनय का प्रेमचंद के लिखे एक नाटक में. कहानी का नाम था 'मंत्र'. इस नाटक के पात्रों का चयन हो चुका था, बस एक - दो की कमी थी. और आशीष को मुझसे अच्छा बकरा नहीं मिला. मैंने अपने स्वभाव अनुसार - इस निमंत्रण को प्रेम पूर्वक अस्वीकार कर दिया. कारण - एक तो स्टेज फीयर और दूसरा ऐसा कोई शौक न होना. पर आशीष जबरदस्ती पीछे पड़ा ही था. नहीं .. नहीं .. तुमको करना है.. संजय को उसने पहले ही तैयार कर लिया था. संजय भी हमारे साथ पढता था. मैं बहुत देर तक ठहर नहीं पाया. क्योंकि मेरे को डर था, कि अगर नंदलाल सर तक बात पहुँची तो, बस उनका वीटो आते ज्यादा देर नहीं लगेगी. ३६ सवाल और पूछे जायेंगे. आख़िर अब मेरे पास और कोई चारा नहीं था.

बस उस नाटक और उसमें अपने अभिनय के बारे में कभी और लिखूंगा. बस इतना बता दूँ, पूरे एक महीने चली रीहर्शल में मेरा और संजय का आपस में बातचीत करते हुए स्टेज के एक कोने से चलते हुए दूसरे कोने में निकल जाना था.

संजय का संवाद था - अरे भाई चड्ढा बाबु का तो घर ही उजाड़ गया.

मेरा संवाद था - हाँ भाई, सुना है, वही तो एक लड़का था.

आशीष लाल तो नायक थे. एक घंटे तक चलने वाली रीहर्शल में मैं बस अपनी इन लाइनों को बोलने के लिए इन्तेजार करता रहता था. आज भी मैं चड्ढा बाबु को भूल नहीं पाया हूँ.

तो इस प्रकार भय की वजह से - मेरा अभिनय के क्षेत्र में ये छोटा किंतु पहला कदम था.

अभी सब कुछ ऐसे ही चलता. पर एक दिन नंदलाल सर ने हमारी छोटी बहन की किसी बात पे पिटाई कर दी. और उसने जो रोना मचाया कि बस अगले दिन घर में मीटिंग बैठ गई. और फैसला लिया गया कि अगले दिन मास्टर साब से इसकी शिकायत दर्ज होगी. माताजी ने अगले दिन माट्साब की क्लास ली. पिताजी का पूरा सहयोग था. हमारे सर जी ने बात सुनी. फिर अगले दिन वो आए, और उन्होंने कहा - 'तुम समय पे काम नहीं करते हो, जो मैंने कल काम दिया था वो पूरा नहीं है. मैं ऐसे नहीं पढ़ा सकता' और बस उठे और उठ के चल दिए. हम भाई - बहन को तो एकदम सांप सूंघ गया. लगा, कि इसके जिम्मेदार हम ही माने जायेंगे और घरवाले बोनस धुलाई करेंगे. पर भगवान् का शुक्रिया था - हम समझदार न थे पर घरवाले जानते थे. उन्होंने हम बच्चो को समझाया - 'बेटा, इसमें तुम्हारी गलती नहीं है' ... वो माट्साब जान गए थे कि अनायास मारपीट का उनका फार्मूला यहाँ नहीं चलेगा. बस ३ महीने ही हम उनके चेले रह सके.

वो सब तो ठीक था, पर अभी तो अर्ध-वार्षिक परीक्षा सर पे आ गई थी. किसी तरह पिताजी ने एक मास्टर साब की व्यवस्था की. वो स्टेशन मास्टर थे.. पर बिना पिटाई किए पढाते थे. हमारे अच्छे नम्बर आए अपनी कक्षा में . फिर वार्षिक परीक्षा में भी अच्छे नम्बर आए. तो एक दिन नंदलाल सर ने क्लास के सामने मेरे को बुला के कहा - देख रहे हो इसे - इसकी क्लास में पोसिशन आई है - क्यों? मालूम है, क्योंकि इसको मैंने पढाया है.

अब कोई चाहे जो भी कहे. मेरे लिए तो वो ३ महीने काफी मायने रखते हैं. मैं आज वास्तव में अगर अपनी कक्षा में एक अच्छे बच्चों में गिना जाने लगा था, तो उसमें जरूर ही नंदलाल सर और मेरे घरवाले, मेरे माता - पिता की दूरदर्शिता थी. तब नहीं समझ आता है. पर आज पीछे मुड के देखता हूँ, तो सब समझ में आता है, कि यही चंद महीने, घंटे आपकी जिंदगी को नई दिशा देने के लिए काफी होते हैं. आज भी मैं जब किसी बड़े से मिलता हूँ, खासकर अपने गुरूजी लोगों से तो कभी सोते हुए, गलती से भी - नमस्ते नहीं, सिर्फ़ प्रणाम करता हूँ.

1 comment:

  1. bahut khoob. pahle ke teachers student kee life bana dete the

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विचारों को पढने और वक्त निकाल के यहाँ कमेन्ट छोड़ने के लिए आपका शुक्रिया

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