मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"

Tuesday, October 7, 2008

हमारे भाई लोग हमारा लूटा हुआ पैसा वापस ला रहे हैं

DollarImage by S.Das via Google Search
यार, यहाँ आ के लग रहा है, कि लोग इंसान हैं. मैं तो इंसान का मतलब ही भूल गया था.

'ठीक कह रहा है तू.' - फ़ोन के इस तरफ़ मैंने अनमने मन से सहमति जताते हुए कहा. अब दोस्त अमेरिका से फ़ोन कर रहा था. ऐसे ही थोड़े न नहीं कर देता.

मैंने बात आगे बढाते हुए कहा, और मेरे को लगता है, कि सारी दुनिया वाले चप्शण्ड मेहनत सिर्फ़ इसीलिए कर रहे हैं, कि अमेरिकन लोग - समय से ऑफिस से अपना काम पूरा कर के अपने घर समय से पहुँच सकें. उनको दिन में ४८ घंटे बिजली हमेशा मिलती रहे. सड़कें मस्त हों. ट्रैफिक सटासट भागे. और वो अपने सारे शौक़ पूरे कर सकें.

'लाइफ की - एक इंसान के जिंदगी की कितनी वेलू है यार इधर. समझ में नहीं आता है.' - दोस्त ने अपना पक्ष रखा. 'तभी तो सारे चिंतन के विषय इधर आके ही लोगों के दिमाग में आते हैं.'

फिर मेरे को याद आया, कि किस तरह से अंगरेजी सिनेमा में दिखाया जाता है, कि कभी ज्वालमुखी फट गया, तो कभी बरफ और मौसम ऐसा हो गया कि सारी मानव जाति पे संकट मंडराने लगा. और तो और, सारे विदेशी ग्रहों के आक्रमण भी तो यहीं अमेरिका में ही होते हैं. सही है यार, ये दूसरे ग्रह वाले भी सब कुछ जानते हैं.

सारी बातें, मेरे देश के ख़िलाफ़ जा रही थीं, मेरे को कुछ ऐसा नहीं सूझ रहा था. कि मैं क्या कहूं कि बस एक बार में चित्त. बनारस का हो के मैं इस बकर में हारना नहीं चाहता था. बस मैंने शुरू किया. यार अमेरिका में भी लोकतंत्र है, है कि नहीं - 'हाँ' और हमारे देश में भी - है कि नहीं. बोल? 'है' ठीक, तो तुने देखा होगा, अमेरिकन सिनेमा में उनके राष्ट्रपति को हमेशा दिखा दिया जाता है, पर तुने अभी कभी कोई इंडियन सिनेमा में देखा है, कि प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का चेहरा दिखाया जाता है. 'नहीं' आसान जबाब. मैंने आगे समझाते हुए कहा.. यार, बहुत सीधी सी बात है, अपने इधर बहुत खतरा है, तभी तो अगर कहीं सिनेमा में चेहरा दिखा दिया तो बस - अभी जिसके ऊपर ज्यादा खतरा - वो ज्यादा महत्वपूर्ण हुआ कि नहीं?

'यार, इधर ये अमेरिकन लोग - ९११ खूब घुमाते हैं'. - दोस्त ने बात को नया मोड़ देते हुए कहा. मैंने कहा - बस तेरे उधर एक नम्बर है, मेरे इधर १००, १०१, १०३ और न जाने कितने नम्बर हैं. छोड़ यार तू अभी विदेश में है, तो बस इस तरह अपने देश को बदनाम मत कर. उसने पूछा - तुने कभी इनमें से कोई नम्बर मिलाया है? मैंने कहा - काहे को भगवान् न करें.. वैसे अब नम्बर है तो ... मैंने बात वहीँ ख़तम कर दी.

इस बार मैंने बातों की कमान संभाली - सीधा सवाल पूछा. 'उधर, आख़िर कोई संस्कार है' - लोगों में कोई शांती नहीं है? यार तुम देखते हो - वहां कितने तलाक होते हैं. लोगो में कितनी दूरियां हैं. लोग बस भौतिक सुख के पीछे भाग रहे हैं. '

मैं जानता था, 'ये ब्रह्मास्त्र होता है, किसी भी भारतीय का' - उधर थोड़ी देर तक चुप्पी रही. फिर धीरे से आवाज आती है. यार ये संस्कार चलो कहीं और रख के - लोगो के लिए रोटी ले के आते हैं. मैं यहाँ आया हूँ - यहाँ से डॉलर अपने देश में ला के अपने देश को फिर से सोने की चिडिया बनाना है. हमारा देश गरीब है, हमें बहुत काम करना है. एक वक्त था, जब अंग्रेज बाहर से आए थे - तब हम चैन से बैठे थे, और वो सब लूट के चले गए... अब ये हमारा वक्त है, हमने अपने यहाँ के बौधिक संपदा को धीरे - धीरे विदेशों में फैला दिया है. अब ये हमारे भाई लोग हमारा खोया पैसा - लूटा हुआ पैसा वापस ला रहे हैं.

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