मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"

Tuesday, October 7, 2008

ये विद्रोह आख़िर है किसके ख़िलाफ़

मैंने बहुत से ब्लॉग पढ़े इधर बीच. ज्यादातर में तमाम तरह की समस्याओं की एक से बढ़कर चर्चा की गई थी. कोई राजनीति तो कोई देश की गरीबी, तो कोई देश की आबादी, और भी जाने क्या क्या. मैं नहीं सोच पाता हूँ इन सब चीज़ों के बारे में ज्यादा. शायद मैं सोचना ही नहीं चाहता हूँ. मैंने समाचारपत्र पढ़ना काफी समय पहले बंद कर दिया. फिर आया न्यूज़ चैनल का जमाना. ऐसी गंध मचाई इन लोगों ने की पूछो मत. मन उचाट हो गया. हर तरफ़ समाचार बेचा जा रहा था. मैं इस समाज में धीरे धीरे outdated होता जा रहा हूँ और मेरे को इसका एहसास भी नहीं हो पा रहा है.

सुन्दरता क्या होती है? मन सुंदर होना चाहिए. कभी भी किसी को बुरा नहीं कहना चाहिए. हमेशा लोगों के बारे में अच्छा सोचो. एक बात और है, जब तक इंसान जिन्दा रहता है, तब तक हम उसकी क़द्र नहीं जानते हैं. ज्यादातर समय हमारा उस कस्तूरी मृग की तरह बीतता है, जिसके बारे में कहा गया हैकस्तूरी कुण्डलि बसै, मृग ढूँढ़त वन माँहि जब तक जो सुख हमारे पास होता है, हम किसी और सुख की तलाश में रहते हैं, फिर कभी भविष्य को सुरक्षित करने में अपने वर्तमान के साथ बड़ा ही सौतेला व्यवाहर करते हैं. अक्सर ऐसा होता है, कि हम कभी अपनी नौकरी, तो कभी पारिवारिक कलह तो कंभी किसी और समस्या में उलझे रहते हैं बस कुछ कुछ चिंता लगी ही रही है. किसी ने सही कहा है, चिंता चिता समान है

सब कुछ जानते हैं, हम लोग. अगर किसी के साथ ये सब बातें करो, तो एक बहुत ही छोटा सा और सीधा सा सपाट जबाब आता है. पर उपदेश कुशल बहुतेरेसही भी है. पर आख़िर हल क्या है. अक्सर जो सत्य एकदम सहज होता है, उसको ही समझने में सबसे ज्यादा टाइम लगता है. किसी से पूछिए आपको वो बतायेगा, कि उसकी जिंदगी सबसे कठिन है. वो सब कुछ सही कर रहा है, पर पता नहीं क्यों उसके साथ एकदम उल्टा हो रहा है. बड़ी नाइंसाफी हो रही है. सब सहमत हैं इस बात से. सबको अपनी कहानी सही लगती है. तो मेरा सवाल ये है, कि अगर सब कुछ ऐसा ही उल्टा हो रहा है, तो भाई इसका हल क्या है. कुछ लोग कहेंगे, इसका कोई हल नहीं है. शायद वास्तव में बहुत से कष्ट होते हैं. जरूर होते होंगे. पर क्या ये सच नहीं है - कि हमें अपना कष्ट तभी तक बड़ा लगता है, जब तक हमको अपने से कहीं ज्यादा दुखी नहीं मिलते हैं, या हमें जब तक इसका एहसास नहीं होता है. ऐसा कोई जिसकी दिक्कतें हमसे ज्यादा बड़ी हैं. और वो हमसे भी ज्यादा दुखी जिंदगी जी रहा है. इस समय दो गाने याद आते हैं

औरों का गम देखा तो, अपना गम भूल गया

राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है, दुःख तो अपना साथी है 
सुख है एक छाँव, आती है जाती है, दुःख तो अपना साथी है.

पर क्या जरूरी है, कि हमको जब दुःख हो तब हमें कोई हमसे ज्यादा दुखी व्यक्ति मिल ही जाए. पर एक चीज तो आप कर ही सकते हैं. आज जो स्थिति में आप है, क्या ऐसा भी हो सकता था, कि इससे भी बुरा हुआ होता. बस एक बार कल्पना कर के देखिये. फिर ठंडे दिमाग से सोचिये. हो सकता है, आपके भाग्य में कुछ और भयानक होना लिखा था, पर इश्वर की कृपा से आज आप कहीं अच्छी हालत में हैं. पर होता क्या हैईश्वर के प्रति शुक्रगुजार होने के बजाय हम लोग एकदम विद्रोही हो जाते हैं. ख़ुद को भी नहीं पता होता है, कि ये विद्रोह आख़िर है किसके ख़िलाफ़. नजरिया बदलिए श्रीमान. किसी को और ख़ास कर अपने आप को माफ़ करना सीखिए. बहुत जरूरी है. वरना समस्याओं की तरफ़ देखेंगे तो बस आप गए. हमेशा दूसरे की जिंदगी दूर से बहुत ही हसीं लगती है. वास्तविकता ये है, कि रोज ऐसे जीइए कि आपको किसी से शिकायत हो. आख़िर जब ऊपर वाले की ही संतान हैं, और अगर सब वही करवा रहा है, तो फिर गम काहे का. बस लगे रहिये. लाइफ इस गुड.


  • लोग 10 सालों की खुशी की तुलना में 10 दिनों के दुःख में ज्यादा सीखते हैं।

  • अगर आप कहीं ग़लत हैं तो इसमें कम-से-कम एक बात अच्छी है - इससे दूसरों को बहुत खुशी मिलती है।

  • दुनिया के आधे लोगों को दुनिया के बाकी लोगों की परवाह नहीं है - इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस तरफ़ हैं।

3 comments:

  1. बेहतर चिंतन, आभार ।

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  2. बहुत बढिया भाई साहब । सही लिखा है आपने।

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  3. एक साकारात्मक नजरिया यह भी सही!!

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विचारों को पढने और वक्त निकाल के यहाँ कमेन्ट छोड़ने के लिए आपका शुक्रिया

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