मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"

Friday, October 10, 2008

हे बुजुर्गों, अपने आप को मत कोसो

मस्त बुजुर्ग लोगImage by Search via Google
"हे बुजुर्गों, अपने आप को मत कोसो. ये मत सोचो की तुमने क्या क्या गर्त में जाते देखा है. मत पछताओ. मजा लो. मजा. अगर तुमको तुम्हारी संतान बहुत कष्ट देती है, तो टेंशन मत लो. मजा लो मजा. तरस खाओ. सोचो ये बच्चे तो अभी बच्चे हैं, और तुम तो निकल जाओगे, पर ये आज की नौजवान पीढी जिस तरह के गड़बड़-झाले में फसी है उसकी कल क्या हालत होने वाली है, तुम सोच भी नहीं सकते."

ऐसा मैं नहीं कहता हूँ कहीं पढ़ा था, कहाँ? याद नहीं.

लेकिन मैं इसका तात्पर्य समझा सकता हूँ. बात ये है, कि इस वक्त की जो पीढी है, बड़ी ही विचित्र स्थिति में है. पिचले १५-२० सालों ने चीजों को इतना कुछ बदल दिया है, कि पूछो मत. अब अपने बाबूजी और उनके बाबू जी के समय के बारे में सोचो. सब कुछ धीरे - धीरे बदलता था. जैसे अगर दादा जी ट्रांजिस्टर सुना करते थे, तो पिता जी लोग रेडियो और स्टीरियो तक ही पहुंचे. फिर जब हमारा जमाना आया तो हमने शुरुवात की ब्लैक एंड व्हाइट टीवी से. फिर अभी न जाने आईपॉड तो और ना जाने कहाँ तक पहुँच गए हैं. और वो भी दिन प्रतिदिन बदल ही रहा है.


दादा जी के समय में इंडिया में कंप्यूटर नहीं था. फिर पिता जी के ज़माने में दिल्ली रेलवे स्टेशन पे कंप्यूटर लगा. हम जब स्कूल गए तो दसवीं में हाथ लगाया पहली बार. अभी के बच्चे लोग - पैदा होते ही लैपटॉप खिलौने की तरह ले के खेलते हैं.

वो जमाना था ट्रांकाल हुआ करता था. फिर पिताजी के पूरे ज़माने में बहुत उन्नति हुई तो टेलीफोन तक बात पहुँची. हमने मोबाइल हाथ लगाया. और अभी छोटे बच्चे पैदा होते ही, पुराने मोबाइल से खेलते हैं, उनको प्लास्टिक का मोबाइल दो, फ़ेंक देंगे.

दादाजी लोग अंगरेजी विदेशी भाषा की तरह सिक्स्थ क्लास से शुरू किए. पिता जी लोग बहुत प्रगति नहीं कर पाये. हम लोग पहली दर्जा से शुरू किए. अभी तो बच्चे प्री - नर्सरी से शुरू कर रहे हैं. फिर भी हमारी हैण्ड राइटिंग और बोलचाल अपने बुजुर्गों से बेहतर नहीं रही.

तो मिला जुला के कहना ये है, कि जिस प्रकार से इतनी तेजी से परिवर्तन हो रहा है हमारे अगल बगल कि हमको आभास ही नहीं हो पा रहा है. हम कहा करते हैं, जेनरेशन गैप के बारे में. पता नहीं हमारे पिता जी और दादा जी के बीच कितना बड़ा गैप था. पर कुछ था. हमारी पिताजी और हमारी बीच उससे कुछ बड़ा गैप था. पर हमारे और हमारी आने वाली पीढी के बीच में कितना बड़ा गैप होगा - शायद मैं तो उसका अंदाजा नहीं लगा सकता हूँ. पर एक बात तो मैं कह सकता हूँ, कि हमारी पीढी तो अपने पिता और दादा की तरह आज भी इस गैप का सामना कर गई. पर जो गैप अभी और आने वाली पीढी में है और आने वाला है, उसका सामना करने के लिए शायद हम तैयार नहीं है.

3 comments:

  1. Wah bade bujurgon ko to aaj maza aagaya hoga aapki post padhkar. mazak mazk men bahut achhi baten kah gaye aap. sahi kaha ki GENERATION GAP badhne ki speed khoob jyada hai. Lekin jo bhi ho ham to chal denge jab tak kuchh problem aayegi. aap wali baat par dhyan de rahe hain, maze karo maze.

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  2. तार करते थे, फ़िर पहले से बुक कराकर ट्रंक काल फ़िर पेज और अब मोबाइल - वाह वाह!

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  3. स्पष्ट है कि जेनरेशन गैप के बढ़ने के कारण ही सारी समस्या है. पर हमें इस समस्या से उबरना होगा अन्यथा एक दिन लोग सिर्फ अपने पीछे इतने मतवाला हो जायेंगे कि वे किसी को पहचानेंगे भी नहीं.

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विचारों को पढने और वक्त निकाल के यहाँ कमेन्ट छोड़ने के लिए आपका शुक्रिया

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