पंचायतनामा

मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"

Friday, May 7, 2010

शादी करोगे तो पता चलेगा... हुंह!!

Sister, Brother & MeImage by El_Sol via Flickr
तीन साल बाद वो भूल जाती थीं... अब हम जब क्लास ६ में थे तो वो ९ में थीं, अब भला हम उनके क्लास में तो जा नहीं सकते थे.. बड़ा परेशान करती थीं.. ये भी अजीब आदत थी.. कुछ भी पूछो तो कहेंगी - अभी ६ में हो ना, जब ९ में आओगे तो पता चलेगा. अभी बहुत आसान लग रहा है ना बेटा!! अभी थोड़े समय में पता चलेगा. अभी बोलो मैथ सेकंड (Maths -2) है तुम्हारे  में .. नहीं  ना !! तो जब ९ में ये सब्जेक्ट आएगा तब पता चलेगा. अभी कर लो मजा. 

टुन्ना को आज अनायास ही ये वाक्या याद आता है. टुन्नी उससे तीन साल बड़ी थी.  और ये आम नोंक झोंक इतनी स्वाभाविक थी कि, आज टुन्ना को एहसास होता है - कि जिन लोगो ने अपने जीवन में इस पल को नहीं जिया है, उन्होंने कितना कुछ मिस किया है. 

जब टुन्ना कुछ समय के बाद टुन्नी के क्लास में पहुँचता .. तो हर विषय की किताबों में वो सवाल खोजता जिसका जिक्र टुन्नी अक्सर किया करती थी. पर अब तो टुन्नी ११ में थी. टुन्ना मन ही मन सोचता था, कि काश एक बार ....  वही दूसरी तरफ टुन्नी मजे से टुन्ना को उसी तरह से टोपी पहनाते हुए आगे बढ़ती रही. 

समय ने पलटा खाया. टुन्नी ने डबल ग्रेजुएशन किया. अब टुन्नी ने MBA में दाखिला ले लिया था. वही दूसरी तरफ टुन्ना ने ग्रेजुएशन के बाद एक दूसरे शहर में नौकरी शुरू कर दी. लगा की सब ख़त्म, पर कहानी अभी बाकी है दोस्त. टुन्ना की कंपनी ने काम के साथ-साथ MBA का मौका दिया. बस फिर क्या था, पलक झपकते ही टुन्ना ने दाखिला ले लिया - और अब शुरू हुआ चुनौती का दौर - लेकिन दोनों अलग शहर में थे - तो उनकी बाते फ़ोन पे ही होती थी. किस सब्जेक्ट में कितना आया पूछ लिया करते थे. पर टुन्नी का पलड़ा फिर भी भारी था. आखिर वो फुल टाइम MBA जो कर रही थी

लीजिये टुन्नी पहुँची टुन्ना के शहर इन्टर्नशिप करने. टुन्ना से जितना बन पड़ा किया - आखिर उनके पास वर्क एक्सपेरिएंस था... तो टुन्नी के रिज्यूमे अपडेट से ले के जो बन पड़ा किया. जिन्दगी में पहली बार टुन्ना को इतनी ख़ुशी मिल रही थी पर फिर भी वो जब तक ये टुन्नी के मुह से नहीं सुन लेता कलेजे को ठंडक नहीं मिलती. 

इससे पहले की टुन्नी कहीं नौकरी करती उसके पहले अचानक ही टुन्नी की शादी हो गई और वो काफी दूर चली गई. टुन्ना के हाथ से समय निकल चुका था. उसको मालूम था कि अगर वो आज टुन्नी से बोलेगा ... तो टुन्नी तपाक बोलेगी - "शादी करोगे तो पता चलेगा - अभी समझ रहे हो ना कि नौकरी बड़ी चीज़ है.. हुंह!!"
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Thursday, February 4, 2010

छोटी छोटी खुशी के वो पल दो पल

Joy of HappinessImage by ~FreeBirD®~ via Flickr

अब लाटरी चाहे चार डालर की लगे या चार रूपये की - पर मन तो खुश होता है ही. मेरे को भी याद है, कि जब हम बनारस के बड़ी पियरी मोहल्ले में रहा करते थे तो एक बार पापा ने मेरे नाम से २ रूपये की लाटरी खरीदी थी, और उसमें शायद १० रुपये निकले थे - वो पापा का उस मोहल्ले के नुक्कड़ के पान वाले को (जो कि लाटरी विक्रेता भी था) अपना लकी लाटरी का टिकेट दिखा के वो १० रूपया लेना आज भी याद है. इस घटना को बीते बाईस साल हो गए.


फिर एक बार दैनिक जागरण की बाल प्रतियोगिता के लाटरी से चुने हुए विजेता के तौर पे मनीआर्डर से भेजे हुए वो २० रुपये का वही  नोट आज भी बनारस में घर में मेरी किसी डायरी में सुरक्षित रखा है. जबकि इस घटना को शायद सत्रह साल हो गया है. अब इसे सनक कहो या पागलपन - ये तो बस ऐसे ही होता है. आदमी कितना भी बड़ा हो जाए - पर दिल तो बच्चा है. वो तो बस अपने अन्दर की ना जाने कौन सी उधेड़बुन में हमेशा उलझा रहता है. उसको कभी पैसे रुपये या आराम शौक ... वगैरह.. से नहीं .. बल्कि बस कुछ भी ऐसा करने में मजा आता है.. बस जिसका कोई कारण नहीं होता है. 

तो जब आदमी खुश होता है, तो वो अपनी खुशी अपने सबसे नजदीकी इंसान से बांटना चाहता है. वो शायद कभी ये बता ना पाए कि उसमें ऐसा क्या ख़ास बात है, कि वो इस ख़ुशी को सबसे बांटने के लिए इस तरह से उत्सुक है. ये इंसान का वो भोला और मासूम रूप होता है. हमको अपने को खुशनसीब समझना चाहिए कि कम से कम हम किसी एक इंसान के इतने करीबी तो बन सके. वरना साथ रहने और ढेर सारा समय साथ गुजरने से भी कभी कभी हम दूर रहते हैं. "कभी दूर कभी पास" - और कभी कुछ लोग दूर रह के भी काफी पास पास और करीब महसूस करते हैं.  - ये कुछ उसी प्रकार से है, जैसे कि बच्चा जब छोटा होता है, तो वो कोई एकदम साधारण सी चीज़ देखता है, और अपने माँ बाप को उस चीज़ की तरफ इशारा कर के उनका ध्यान उस तरफ खींचना चाहता है.. और माँ  बाप उस बात पे खूब खुश हो के उसकी खुशी में शामिल होते हैं. बच्चा और भी खुश हो जाता है. 

Wednesday, January 13, 2010

आज कल इस तरह के निश्छल व्यावहार की कितनी कमी सी है

Ganga Aarti at Varanasi ghats,Image via Wikipedia
हमारे एक बंगलोर के ऑफिस के सहकर्मी इलाहाबाद से गया जाने के वक़्त - प्रोग्राम में कुछ बदलाव की वजह से सुबह से शाम तक के लिए अचानक बनारस पहुंचे. वो खुद थे, उनकी धर्मपत्नी और माता जी  भी उनके साथ थीं. करीब सुबह के वक़्त जब वो बस से बनारस के रास्ते में थे तो उन्होंने अपने प्रोग्राम से मुझे फ़ोन के जरिये अवगत कराया. शाम को उसी दिन उनको मुगलसराय से गया के लिए ट्रेन पकडनी थी. वो लोग वहां पिंड-दान करने जा रहे थे. वैसे बनारस का उनका प्रोग्राम कोई पक्का नहीं था. तो जब  उन्होंने इलाहाबाद से मेरे को अपना ये बदला हुआ प्रोग्राम बताया तो मैंने कहा कि तुम लोग वहां दिन में बनारस में मेरे घर चले जाओ. मम्मी हैं हीं बनारस में. 

ध्यान देने की बात ये थी कि वहां घर पे सिर्फ मम्मी और बुआ जी (जो कुछ दिनों के लिए आई हैं) थी, और मैंने उनसे उनका कोम्फोर्ट भी नहीं पुछा था. कि इस तरह एक दिन के लिए अगर अचानक कोई आ जाए तो उससे कोई असुविधा तो नहीं होगी. बस माँ बाप पे बच्चों का यही विश्वास .. ना जाने ये क्या चीज़ होती है. मेरा मम्मी को फ़ोन पे बताना था.. कि बस मम्मी तुरंत हरकत में आ गईं. मेरे को कितना अच्छा लगा कि आप पूछिए मत. कल को मेरी शादी हो जायेगी और इसतरह से किसी दोस्त को घर पे अचानक बुलाना होगा, तो क्या वही सहयोग प्राप्त हो सकेगा?

मैंने मम्मी से पूछ के उनको नंबर दे दिया. वैसे मैं तो लोगों को घर पे बुलाने से चूकता नहीं. यही कारण है, कि यहीं घर से इतना दूर भी यहाँ मेरी  महफ़िल जमी ही रहती हैं.  तो सब कुछ सेट हो गया... फिर वो बताये अनुसार वहाँ बनारस में शिवपुर स्थित हमारे घर पे पहुँच गए. मम्मी और बुआ ने उन लोगों को उनकी इच्छानुसार विश्वनाथ बाबा और गंगा जी का दर्शन भी करवा दिया. बुआ और मम्मी की मेहमान-नवाजी देख के वो दोस्त एकदम गदगद होगया . वैसे भी उनका भाग्य था.. वरना हम सब तो बस ऊपर वाले के हाथ की कठपुतली हैं. शाम को मम्मी और बुआ ने ससम्मान उनको मुगलसराय के लिए साधन पे बैठा के विदा किया. उसके बाद एस.एम्.एस के जरिये मुझे संछेप में बता दिया . दोस्त ने फ़ोन पे मुझे आभार व्यक्त किया. बुआ जी और मम्मी के लिए वो बस .. कुछ कह नहीं पा रहा था.. जब इंसान को सच्चा स्नेह - बिना आडम्बर का व्यावहार मिलता है - तो यही होता है...आजकल शायद लोग एक दूसरे का इस तरह सम्मान नहीं करते हैं. वहीँ एक अजनबी शहर में  जब इस तरह का सम्मान मिले तो लोगों को आश्चर्य हो - तो ये बड़ी बात नहीं है. वाह!! रे प्रभु...

मेरे को ये नहीं समझ में आता है, कि आज कल इस तरह के निश्छल व्यावहार की कितनी कमी सी है. वरना.. सही मायने में जब भी कोई आता है, तो हमारे घर में  कभी पकवान नहीं बनाया गया होगा - जो भी घर में उपलब्ध है, प्यार से वही मिल बाँट के खाया गया होगा.  आज एक बार फिर मेरा विश्वास इस बात पे और प्रबल  हो गया है कि पैसे से नहीं अपितु सच्चे प्यार से उनको जो खुशी मिलती है, उसका कोई बराबरी नहीं है. लोग अब दूर रहते हैं, उनके पास वक़्त नहीं है, कि वो शनिवार और रविवार को लोगों से मिले. सबके लगता है, कि शायद दूसरे पसन्द ना करें. हम बहुत दूर चले जा रहे हैं. ना जाने किस ओर, किस चीज़ की तलाश में.

जब हम लोग छोटे थे, तब भी हमारे पिताजी लोग , अंकल लोग, सुबह से शाम की ड्यूटी बजाते थे, पर फिर भी, सन्डे को पास - पड़ोसी - सगे संबंधी - रिश्तेदार - नातेदार के लिए वक़्त निकाल ही लिया करते थे. मेरे को याद नहीं कि मेरे घर में कभी किसी के भी आने पे - चाहे वो बता के आये हों या बिना बताये - कि कभी किसी ने जरा भी नाक - भों सिकोडी हो... शायद घर से सीखी हुई यही सब आदत आज घर से इतना दूर रहते हुए भी जीवन जीने का सहारा बनी हुई है.  अपने घर के सभी बड़ों को सत सत नमन.


Monday, December 21, 2009

कुछ चीजें ध्यान रखने की, जब आप किसी को खाने पे घर बुलाये

Bush Comes to Dinner

  1. आपने किसी को बुलाया खाना बनाने में मदद करने में - वो आपके मित्र हैं - उन्होंने अपनी सबसे कीमती चीज़ दी है. उनके साथ आपने कैसे आदान प्रदान किया. यहाँ से शुरुवात होती है. मेहमानों के सामने तारीफ़ को अपने सभी सहयोगियों से बांटना कभी नहीं भूलना चाहिए.
  2. मेहमान ने घर में प्रवेश किया. तो आप जो भी कर रहे हैं, या तो किचेन में हैं या कहीं और - आप किस तरह से मुस्कुरा के .. अपने हाव - भाव से किस तरह से उनका अभिवादन करते हो. एक गहरी मुस्कराहट और नजरों से नजरों को मिला के.
  3. आपके मेहमान अगर अपने बच्चों के साथ आये हैं, तो उनके बच्चों के बारे में पूछना चाहिए. वो क्या कर रहे हैं. और आपको कोशिश करनी चाहिए कि आप उनके बच्चों को उनके नाम से बुलाएं.. अगर आपको मालूम हैं, कि बच्चे छोटे हैं, तो घर के टूटने वाले सामानों को पहले ही हटा दे - जिससे कि बच्चे के माँ बाप को कोई सामन ना टूट जाए इस डर से बच्चे के पीछे - पीछे ना भागना पड़े. 
  4. अगर डिनर पर बुलाया है, तो ये ज़रूर ध्यान दें कि बहुत देर ना हो जाए खाने में - सबका खाने का एक समय होता है. कोशिश ये रहे कि खाना समय पे रेडी रहे और आप भी सबके साथ हंसी मजाक में बातचीत में सम्मिलित हो सकें. अच्छा हो कि पहले ही पूछ ले कि कब खाना ठीक रहेगा सबी सहूलियत के अनुसार. 
  5. खाने के पहले चाय - कॉफ़ी के वक़्त कोशिश करिए कि रोजाना से हट के हो कुछ . बहुत भारी ना हो वरना खाना नहीं खा पायेंगे लोग. कोशिश करिए कि कुछ बहुत ही हल्का डिश हो, जो कि आपने खुद बनाया है - थोडा ही हो.. पर लोग जरूर पसंद करेंगे, क्योंकि आपने बनाया है. मेहमान लोग भी इससे प्रभावित होंगे और बातचीत में आपका इस विशेषता पे भी चर्चा हो जायेगी. आखिर आप ख़ास हैं. आप इन्टरनेट या मैगजीन से देख के कुछ ट्राई कर सकती हैं. 
  6. अपने बारे में ही बात नहीं करनी चाहिए. आपको अपने मेहमानों के शौक़ और पसंद के बारे में चर्चा करनी चाहिए. अगर मेहमान आपके पति के बॉस हैं, तो काम काज के बारे में ज्यादा चर्चा करने से या फिर अनायास की प्रशंशा करने से बचना चाहिए.
  7. अपने पति के बारे में - वो घर पे क्या करते हैं क्या नहीं करते हैं - हल्का फुल्का मजाक वगैरह पूरी सूझ बूझ के ही साथ करना चाहिए. कोशिश कीजिये की ऐसी कोई चर्चा ना हो जो कि आपके पति को पसंद नहीं है. बाहरी लोगों के बीच में जबकि लोग आपकी बातों का समर्थन कर रहे हैं - उस वक़्त किसी बहाव में बहने के बजाय, एक दायरे में ही मजाक करना चाहिए. 
  8. खाना खाते वक़्त ये ध्यान दें कि आप भी साथ में सबके साथ खाने बैठी हैं. व्यायवस्था  ऐसी करें कि आप बीच में ही सही पर सबके साथ ही खाना खाएं. 
  9. अच्छा हो कि खाते वक़्त किसी के कम और ज्यादा खाने पे कोई वक्तव्य देने से बचे. खाने में क्या क्या है, शुरू में ही किसी चर्चा के बहाने बता दें - लोग अपनी पसंद के अनुसार तैयार रहेंगे. बहुत चीज़े मेनू में रखने के बजाय क्वालिटी के बारे में सोचें. 
  10. डेजर्ट में थोडा कम स्वीट या फिर स्वीट्लेस - स्वीट ही रखे - आजकल लोग चीनी अवोइड करते हैं. तो कुछ अलग भी हो जाएगा. अंत में सौंफ जरूर रखें.
  11. विदा के वक़्त दरवाजे तक छोड़ने जरूर आयें - और ये कहना ना भूलें कि बहुत अच्छा लगा उनके आने से और आपका भी दिन अच्छा बीता. 

Friday, December 18, 2009

हमारा शौक़ और काम ऐसा होने का है, कि दूसरों को भी खुशी हो उसमें.

Binnenhof
आज अनायास ही मन थोडा अजीब हो गया. एक तो ससुरा जुखाम है कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है. और दूसरा ये कि मैं दुनिया में जिस से भी मिलता हूँ उसके पास टाइम की बड़ी ही समस्या होती है. बड़े ही व्यस्त लोगों के बीच में उठना - बैठना है. सौभाग्य है कि दुर्भाग्य.

कभी इस तरह के मुस्कुराते चहरे को देखता हूँ और सोचता हूँ कि उनकी हालत कैसी है, फिर भी क्या मुस्कराहट है. और वहीँ एक तरफ थोडा नमक और चीनी कम हो जाने से मन खट्टा करने वाले भी लोग हैं. भाई, अगर बहाना बना के दुखी रहना है, तो कोई कुछ नहीं कर सकता है. टाईम निकाल के थोडा खुश भी हो जाइए - हमारे मास्टर कहते थे, कि इससे कुछ घट नहीं जाएगा.


मैंने एक चीज़ गौर की है, कि अगर हम दूसरे काम की तरफ अपना ध्यान नहीं लगायेंगे, तो हमेशा हमारा ध्यान एक तरफ ही खिंचा रहता है. अब ये दूसरी तरफ ध्यान लगाने के लिए बस एक चीज़ की ज़रुरत है, और वो है, कि एक छोटा सा चिरकुट सा काम और शौक ढून्ढ लेने का. जैसे हो सकता है, कि आपने सोचा है, कि बहुत दिन हुआ मंदिर नहीं गए, कोई नई किताब नहीं पढी, या फिर किसी दोस्त को फ़ोन नहीं किया या फिर कुछ भी. बस सोचना क्या है, कर डालिए. येही सब दूसरा काम है.

दूसरी एक बात और जो कि गौर करने कि है, वो ये कि, अगर आप सिर्फ ऐसे काम करेंगे जिससे कि आपको ही सुख मिलता हो, तो बात नहीं भी बन सकती है. हमारा शौक़ और काम ऐसा होने का है, कि दूसरों को भी खुशी हो उसमें. जैसे कि अगर हम किसी की तरफ देख कर जब मुस्कुराते हैं, तो दूसरे भी स्वतः: मुस्कुराने लगते हैं , उसी तरह से कई बार हमारे अच्छे और रोचक व्यावहार से दूसरों को गजब का मजा आता है. और आप भी मस्त हो जाते हैं.



Sunday, December 6, 2009

सब कुछ आपके अच्छे और भले के लिए ही हो रहा है.

Playground in Firehouse Mini Park and, in back...Image via Wikipedia
हम हमेशा से करना चाहते हैं. जैसे कोई किताब लिखना चाहता है, तो कोई कुछ जगहों पे घूमना चाहता है. तो किसी की ख्वाइश होती है, कि वो समाज-सेवा करे, वगैरह-वगैरह.  मेरे एक मित्र है, वो हमेशा जब भी वक़्त मिलता है, कहीं घूमने निकल जाते हैं. मेरे को बड़ा आश्चर्य होता है, कि भला आज की भागती-दौड़ती जिन्दगी में जबकि लोग हमेशा यही शिकायत करते हैं, कि समय नहीं है. भीड़ बहुत है. वहीँ ये जनाब है, कि बस मनमौजी की तरह जैसे ही वक़्त मिला - बस निकल लेते हैं. मैं बहुत कुछ सीखता हूँ उनसे. ऐसा नहीं कि उनके पास ऑफिस में काम कम है, या फिर वो बहुत ही फालतू है. जी नहीं. बहुत ही जिम्मेदारी वाला काम है ऑफिस में उनका भी. काफी दौड़ -धूप भी है. पर शायद अपने लिए इस तरह कुछ वक़्त निकाल लेने से वो काफी तरोताज़ा महसूस करते हैं. और बस वो वही करते हैं. और इससे उनको जो ताकत मिलती है, वो ही उनको खड़ा रखती है.

हम सब लोग हमेशा यही सोचते हैं, कि बस किसी तरह बस आज की समस्या से बाहर आ जाएँ, बाकी बाद में देखेंगे. लगता है कि हम ये मान के बैठे हैं, कि हमारे पास बहुत ही लम्बी ज़िंदगी है. और पूरा विश्वास है, कि कल कोई और समस्या अपना चौड़ा सा मुहं फैलाए उनके सामने नहीं आके खड़ी होगी . जी ये तो एकदम टॉप का सच है, कि समस्या कभी ख़त्म नहीं होती है, बस उसका स्वरुप बदल जाता है. तो ज़रुरत इस बात की है, कि समस्या को नजरंदाज कर के अपने जीने के लिए जो बहुत ही जरूरी है, उसके लिए समय निकालें. वो करें, जो करना आप हमेशा ही चाहते हैं. बड़ी ही शांती मिलती है. किसी ने  सही कहा है , कि अगर हमें ऐसा काम करना हो, जो कि हमें बहुत ही पसंद है, तो हमें उस काम में थकावट का एहसास नहीं होता है. तो अब होता ऐसा है कि हमेशा तो हमें मन माफिक काम मिलेगा नहीं. तो मैं क्या कहुँगा कि जो भी काम और परिस्थितियाँ  बने, बस अपना मन उसके माफिक बना लेना चाहिए. पर अक्सर होता ऐसा नहीं है, हम इसके विपरीत काम करते है. हमें अनायास ही अपनी सारी ऊर्जा उन परिस्थितियों को अपने अनुसार बनाने में खर्च कर देते हैं. और आप ज़रूर मानेंगे कि ऐसा करने से कुछ हासिल नहीं होता है.

एक कड़वा सच है, कि जो भी होता है, वो अच्छे के लिए ही होता है. बस हमें वक़्त लगता है उसे समझने और स्वीकार करने में. और ये वक़्त ज्यादा लगेगा या कम, ये इसपे निर्भर करता है कि हम कितना सकारात्मक सोचते हैं. कोई है, जो कि हमेशा आपके अच्छे के बारे में ही सोच रहा है, ये सारा संसार और आपके अगल-बगल की घटनाएं आपको आपकी सफलता की ओर ले जाने के लिए सारा जुगाड़ कर रही हैं. बस आप एक बार विश्वास भरी नज़र से देखिये तो. सब कुछ आपका अपने है. सब कुछ आपके अच्छे और भले के लिए ही हो रहा है.




Thursday, November 26, 2009

जय जवानी बाबा !

Sonic YouthImage by Dunechaser via Flickr

ये बाबा प्रकट नहीं हुए थे. जवानी बाबा का अवतार नहीं हुआ था. कलयुग में बड़ा ही महत्त्व है जवानी का. जवानी बाबा कहते हैं, कि हमें अपनी जवानी का घमंड नहीं होना चाहिए. कुछ लोग जवानी के जोश में पूरी दुनिया को बदल देना चाहते हैं. तो वहीँ जब एक बार जवानी चली जाती है, तो कुछ लोगों का तबका है, जो कि बड़ा ही शोक मनाता है जवानी जाने का. पर जवानी बाबा का कहना है, कि वो आपका साथ तब तक नहीं छोड़ते हैं, जब तक कि आप खुद उनको जाने के लिए नहीं कहते हैं. बोलिए जय जवानी बाबा की.


जो बुरा काम करता है, उससे जवानी बाबा रूठ जाते हैं. कुछ लडकियां अपनी जवानी में बहुत से जवान लड़कों को फांस्ती हैं - वैसे कुछ मनचले भी हवा में बह जाते हैं. जवानी बाबा का आदेश है कि अपने फायदे के लिए जवानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए. अगर आप अपनी जवानी का सही उपयोग करते हैं, तो जवानी बाबा आपको बोनस में लम्बे समय तक जवान रहने का आशीर्वाद देते हैं.

कुछ बूढ़े लोग अपने अगल-बगल की जवानी को देख के इर्ष्या करते हैं - जवानी बाबा का सख्त आदेश है कि अगर वो ऐसा करना बंद नहीं करेंगे तो अगले जन्म में से उनकी जवानी काट ली जायेगी. कुछ लोग अपनी सारी जवानी किसी दूसरे की कहानी सुनने में बिता देते हैं, और उनको पता ही नहीं चलता कि समय कब निकल गया. जवानी बाबा का कहना है, कि ये जवानी का दुरूपयोग है.

सिनेमा में जवानी शब्द को बदनाम किया जा रहा है. इसका जवानी बाबा समर्थक पुरजोर विरोध करते हैं. जवानी को बड़े ही छिछोरे तरीके से प्रस्तुत किया जाता है. इससे जवानी में लोग बहक जाते हैं. एक गाने में तो हद ही हो गई है. गाने के बोल कुछ ऐसे हैं - 'निगोड़ी कैसी जवानी है, ये बात सुने ना मेरी .... बड़ी हरामी है.. ' जवानी बाबा अपनी कसम दिलाते हुए उनके नाम का दुरूपयोग किये जाने को सामजिक पतन की संज्ञा देते हैं.

आइये हम सब मिलकर सच्चे मन से कसम खाएं कि हम जीवनपर्यत्न जवानी बाबा के बताये रास्ते पे चलेंगे. जय जवानी बाबा की.


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