पंचायतनामा

मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"

Sunday, January 20, 2013

'का गुरु! हो गईला न बड़ा - मजा आवत ह'

grown up
Grown up (Photo credit: tvlistings.zap2it.com)
तब हम बड़े न हुए थे, छोटे बच्चे थे, लम्बाई भी कोई ज्यादा नहीं थी कि लोग बाग़ छोटा न समझें. बहुत जल्दी थी, बड़ा होने की. क्योंकि, अक्सर ऐसा होता था - कि उमर में बड़े भइया, चाचा या फिर पड़ोस में देख के लगता था, कि बड़ा हो जाऊं, तो बस फिर कभी डांट नहीं पड़ेगी.. राय देने की लत तो शुरू से ही थी, पर कभी किसी ने भाव नहीं दिया, छोटा होने के ये सब नुकसान समझ में आते थे... कोई भी काम पड़ा, तो सबसे छोटा होने की वजह से सीधे सबके आर्डर का भरपूर पालन करना पड़ता था.. बड़ी खीज होती थी... लगता था, कब बड़े होंगे.. समय मानो कितना धीरे - धीरे बीत रहा था...

और अब बड़े हो गए हैं। बड़े होने का एहसास होते ही वो पुराना बचपन मानो दूर से मुह चिढ़ा के कह रहा हो। 'का गुरु! हो गईला  न बड़ा - मजा आवत ह' - अरे काहे का मजा यार - "जब आप छोटे होते हैं तो बड़े होना चाहते हैं, जब बड़े होते हैं तो छोटे होना चाहते हैं।" मन करता है, कि  फिर से कोई डांटे - काम कैसे सही तरह से किया जाता है बताये। और जब गलती हो, तो साथ में खड़ा हो और फिर उसी बचपन की तरह कहे - "गिरते हैं शाह सवार ही मैदाने जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरे जो घुटने के बल चले " अब तो छोटी सी गलती पे मजा लेने वाले ज्यादा हैं और हितैषी कम। कम उम्र में हमारी हर बात पे ध्यान दिया जाता था। बड़े हो जाने  पे जब तक आप गलती नहीं करते तब तक कोई आपकी और ध्यान नहीं देता। वाह रे दुनिया का बड़प्पन! जैसे नींबू के शरबत में आर्टीफीशियल फ्लेवर होता है जबकि बर्तन धोने के लिक्विड में असली नींबू डालने का दावा करते हैं। अरे मैं कहता हूँ, कहे किसी की गलती पे हंसिये मत, उसे शर्मिंदा मत करिये बल्कि गले लगा लिजीए । किसी को गले लगाना  सर्वोत्तम उपहार है - एक ही साइज़ सभी को फिट आता है और एक्सचेंज करने में भी कोई समस्या नहीं होती। और याद रखिये लोग आपकी मान्यता का विरोध कर सकते हैं पर आपके प्रेम का नहीं। भगवान हमारे हांथों से ही अपने बच्चों को गले लगाता है।

उम्र के साथ साथ प्रेमिका और शादी की बाते भी उठाने लगती हैं। अगर आपकी कोई प्रेमिका नहीं है तो आपके जीवन में कुछ कमी है, लोग ऐसा आपको बताएँगे। और अगर आपकी कोई प्रेमिका है तो आपके जीवन में कुछ नहीं है ऐसा आपको एहसास होगा। पर सौ बात की एक बात है, कि  आप परेशान न हों और अपनी परेशानियों से दूर न भागें, क्योंकि जब वे आपको पकड़ेंगी तब आप उनसे भागते-भागते थक चुके होंगे। अब्राहम लिंकन ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति के चरित्र की दृढ़ता आंकना चाहते हों तो उसे शक्तियां और अधिकार दे दें। - मैं कहता हूँ, कि यदि आपको किसी का कुछ भी आंकना है तो उसको एक प्रेमिका दे दें जो कि बाद में उसकी बीवी बने। शादी वह क्षण है जहाँ आप यह नहीं कह सकते - "चलो सब कुछ भूल जाते हैं".


योग्यता आपको शिखर तक ले जा सकती है पर आपका चरित्र आपको वहां बनाये रखता है। किसी भी संवाद में सबसे ज़रूरी है वह सुनना जो कहा नहीं जा रहा हो। अपने कार्यस्थल पर हमें उनके प्रति आदर और समर्पण दिखाना चाहिए जो उपस्थित नहीं हैं, इस प्रकार हम उनका विश्वास प्राप्त कर लेते हैं जो उपस्थित हैं। इसका मतलब ये नहीं कि आप झूठी प्रशंशा कीजिये।  

इन दिनों हम ऐसी चीज़ों को खरीदना चाहते हैं जिनकी हमें ज़रूरत नहीं हैं, ऐसे धन से खरीदना चाहते हैं जो हमारे पास नहीं है, और उन लोगों को दिखाने के लिए खरीदना चाहते हैं जिन्हें हम पसंद नहीं करते। वाह रे मुर्खता! मूर्ख लोग जब एक समूह बनाकर खड़े हों तो उनकी ताक़त को कम न आंकें। और हाँ किसी को भी अपने जैसा बनाने की कोशिश न करें। भगवान जानता है कि आप जैसा एक ही काफी है। फिर भी कहूँगा कि
चीज़ों के उजले पक्ष की तरफ़ देखने से आज तक किसी की भी आँखें ख़राब नहीं हुईं और जैसा कि  एलिअनोर रूजवेल्ट ने कहा है कि आपकी अनुमति के बिना कोई भी आपको छोटा नहीं बना सकता तो बस बड़े होने पे इतना भी गम मत करिए। जरा उस शराबी के बारे में विचार करिए जो कि वही सब बकता है जो शराब न पीनेवाले सोचते हैं।

मस्त रहिये। एक दिन आएगा जब आपकी ज़िंदगी आपकी आंखों के सामने एक फ़िल्म की तरह दिखेगी, इसलिए एक बेहतर ज़िंदगी जियें। इटालियन कहावत है कि - शतरंज का खेल ख़त्म हो जाने पर राजा और पैदल सिपाही एक ही डब्बे में चले जाते हैं। अतः हमें सदैव उदार और दयालु होना चाहिए - चार चींटियाँ जंगल से गुजर रही थीं। उन्होंने एक हाथी को आते देखा। पहली चींटी बोली - "इसे ख़त्म कर देते हैं"। दूसरी चींटी बोली - "इसकी टांग तोड़ देते हैं"। तीसरी चींटी बोली - "इसे उठाकर फेंक देते हैं"। चौथी चींटी बोली - "इसे जाने दो यार, ये अकेला है और हम चार"।

Friday, January 18, 2013

इन्टरनेट - एक साधन है पर साध्य नहीं।

A book scanner at the Internet Archive headqua...
A book scanner at the Internet Archive headquarters in San Francisco, California. (Photo credit: Wikipedia)
कुछ लोग कहते हैं कि  आजकल का नया जमाना है। लोग किताब नहीं पढ़ते बल्कि वो जानकारियों के लिए इन्टरनेट पे ज्यादा आश्रित हैं। अब इन दोनों जरिये से जानकारी ली जा सकती है। हाँ, ये अब रीडर के खुद के ऊपर निर्भर करता है, कि  वो किस जरिये से किस तरह की जानकारी लेता है। 

इन्टरनेट पे तमाम जानकारियां ऐसी हैं, जिसको लोगो ने अपने अनुभव के आधार पे लिख डाला  है। अब अनुभव सही और गलत भी हो सकते हैं। अब जैसे मैं जब इस ब्लॉग को लिख रहा हूँ, तो ये एक प्रकार से इन्टरनेट पे मेरे अनुभव से जुड़ा हुआ ही है। वहीँ पर किताब एक ऐसी चीज़ है, जिसे पूरी तरह से रिसर्च के बाद लिखा जाता है। कई लोग उसका रिव्यु करते हैं और तब कहीं जा के कोई किताब मार्किट में आती है। 

किताब को पब्लिश करने से लेकर स्टोर तक पहुँचाने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल और अत्यधिक समय लेने वाली है। वहीँ एक नुक्सान और होता है - कि  ऐसे वो तमाम विषय जो बहुत ही जल्द बदल जाते हैं, उनके ऊपर किताब लिख कर बुक स्टोर में पहुँचाना बहुत घाटे का सौदा साबित हो सकता है। जैसे एक उदहारण है, टूरिस्ट गाईड का। एक जनाब ने एक टूरिस्ट किताब बुक स्टोर से खरीदी और उसमे बताये अनुसार पहुँच गए एक तालाब के किनारे जो नार्थ ईस्ट चीन में नार्थ कोरिया के सीमा के समीप था। अब किताब में लिखा था की वहां कोई समस्या नहीं है। पर वो क्षेत्र निषिद्ध क्षेत्र निकला और जनाब को सैनिकों ने पकड़ के 1 महीने की कैद में डाल  दिया। बाद में गाइड ने उनसे क्षमा माँगी। 

वहीँ इन्टरनेट की ख़ास बात ये है, कि  उसके जरिये हम जानकारी को बहुत ही जल्दी उसके रीडर तक पहुंचा सकते है। ऐसे तमाम सब्जेक्ट (उदाहरण - ट्रेवल गाइड etc.) के लिए इन्टरनेट एक अच्छा साधन साबित हो सकता है। आपने अभी पढ़ा भी होगा कि  अब कुछ किताबे भी हैं जो कि सीधे सीधे डिजिटल फॉर्म में ही रिलीज़ हो रही हैं। इसका प्रमुख कारण है - सुगमता। ये बहुत ही अच्छी बात है। उन सारी परखी हुई जानकारियों को अगर कोई हमें  डिजिटल माध्यम से पहुंचा रहा है, तो बहुत अच्छी बात है। धीरे धीरे इसका महत्व बढेगा ही। पर मैं उन तमाम जानकारियों को लेके चिंतित हूँ, जो कि हम आप जैसे तमाम पार्ट टाइम स्वयम्भू लेखक और एडिटर्स इन्टरनेट पे प्रतिदिन पब्लिश कर रहे हैं। नहीं-नहीं मैं क्वालिटी को लेके चिंतित नहीं हूँ। पर होता क्या है, कि सभी जानकारियां पूर्ण नहीं होती। आपस में जुडी नहीं होती। और इन्टरनेट सर्च हमको ऐसी ही तमाम अधूरी कड़ियों की एक सूची देता है और हम उसी में खो जाते हैं। सर्च सुविधा की वजह से हम इन्टरनेट पे ज्यादा आसानी से सर्च करते हैं बावजूद इसके कि हमारे पास उस सब्जेक्ट की एक बेहतरीन किताब घर में है। 

मेरा मानना है कि हमको किताबों की अहमियत को नहीं भूलना चाहिए। जहाँ तक हो सके इन्टरनेट का उपयोग एक इंडेक्स की तरह करना चाहिए और फिर संपूर्ण विस्तृत जानकारी के लिए किताब (हार्ड कॉपी ये डिजिटल कॉपी) पे ही निर्भर होना चाहिए। इन्टरनेट की सुविधा का सही उपयोग करना चाहिए। ये एक साधन है पर साध्य नहीं।

Wednesday, January 16, 2013

बनारस याद आता है

Varanasi Street
Varanasi Street (Photo credit: bestarns)

Kachauri-jalebi, #samosas, lassi, rabari, thandai -- the list of mouth-watering #food available on the #streets of #Varanasi is endless.

मैं ये सब मिस करता हूँ. वो चाय पीना, वो दूकान के किनारे खड़े होकर गांडीव पढना. फिर जब बगल से थानेदार की गाडी गुजरे तो बगल हो लेना. जब से शहर छूटा है, सब कुछ भूला सा लगता है.

मैं पहले सोचता था, कि ये सब मेरे ही साथ हो रहा है, पर औरों को देखता हूँ, तो लगता है, कि मैं फिर भी ठीक हूँ और लोग तो अपने शहर से निकले तो फिर किसी शहर के ना हो सके. जब कोई नया शहर मेरे को अपनाता है, तो मैं सोचता हूँ, कि जय हो बनारस. तुमने मुझे जीना सिखलाया - उन विपरीत परिस्थितियों में भी किसी कि शिकायत ना करना सिखलाया. तुमने मुझे ऐसा बनाया ....

वो मुझे भूल ही गया होगा, इतनी मुद्दत कोई खफा नहीं रहता।

Friday, May 7, 2010

शादी करोगे तो पता चलेगा... हुंह!!

Sister, Brother & MeImage by El_Sol via Flickr
तीन साल बाद वो भूल जाती थीं... अब हम जब क्लास ६ में थे तो वो ९ में थीं, अब भला हम उनके क्लास में तो जा नहीं सकते थे.. बड़ा परेशान करती थीं.. ये भी अजीब आदत थी.. कुछ भी पूछो तो कहेंगी - अभी ६ में हो ना, जब ९ में आओगे तो पता चलेगा. अभी बहुत आसान लग रहा है ना बेटा!! अभी थोड़े समय में पता चलेगा. अभी बोलो मैथ सेकंड (Maths -2) है तुम्हारे  में .. नहीं  ना !! तो जब ९ में ये सब्जेक्ट आएगा तब पता चलेगा. अभी कर लो मजा. 

टुन्ना को आज अनायास ही ये वाक्या याद आता है. टुन्नी उससे तीन साल बड़ी थी.  और ये आम नोंक झोंक इतनी स्वाभाविक थी कि, आज टुन्ना को एहसास होता है - कि जिन लोगो ने अपने जीवन में इस पल को नहीं जिया है, उन्होंने कितना कुछ मिस किया है. 

जब टुन्ना कुछ समय के बाद टुन्नी के क्लास में पहुँचता .. तो हर विषय की किताबों में वो सवाल खोजता जिसका जिक्र टुन्नी अक्सर किया करती थी. पर अब तो टुन्नी ११ में थी. टुन्ना मन ही मन सोचता था, कि काश एक बार ....  वही दूसरी तरफ टुन्नी मजे से टुन्ना को उसी तरह से टोपी पहनाते हुए आगे बढ़ती रही. 

समय ने पलटा खाया. टुन्नी ने डबल ग्रेजुएशन किया. अब टुन्नी ने MBA में दाखिला ले लिया था. वही दूसरी तरफ टुन्ना ने ग्रेजुएशन के बाद एक दूसरे शहर में नौकरी शुरू कर दी. लगा की सब ख़त्म, पर कहानी अभी बाकी है दोस्त. टुन्ना की कंपनी ने काम के साथ-साथ MBA का मौका दिया. बस फिर क्या था, पलक झपकते ही टुन्ना ने दाखिला ले लिया - और अब शुरू हुआ चुनौती का दौर - लेकिन दोनों अलग शहर में थे - तो उनकी बाते फ़ोन पे ही होती थी. किस सब्जेक्ट में कितना आया पूछ लिया करते थे. पर टुन्नी का पलड़ा फिर भी भारी था. आखिर वो फुल टाइम MBA जो कर रही थी

लीजिये टुन्नी पहुँची टुन्ना के शहर इन्टर्नशिप करने. टुन्ना से जितना बन पड़ा किया - आखिर उनके पास वर्क एक्सपेरिएंस था... तो टुन्नी के रिज्यूमे अपडेट से ले के जो बन पड़ा किया. जिन्दगी में पहली बार टुन्ना को इतनी ख़ुशी मिल रही थी पर फिर भी वो जब तक ये टुन्नी के मुह से नहीं सुन लेता कलेजे को ठंडक नहीं मिलती. 

इससे पहले की टुन्नी कहीं नौकरी करती उसके पहले अचानक ही टुन्नी की शादी हो गई और वो काफी दूर चली गई. टुन्ना के हाथ से समय निकल चुका था. उसको मालूम था कि अगर वो आज टुन्नी से बोलेगा ... तो टुन्नी तपाक बोलेगी - "शादी करोगे तो पता चलेगा - अभी समझ रहे हो ना कि नौकरी बड़ी चीज़ है.. हुंह!!"
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Thursday, February 4, 2010

छोटी छोटी खुशी के वो पल दो पल

Dinodia.com
Lottery (Photo credit: Internet - Dinodia.com)

अब लाटरी चाहे चार डालर की लगे या चार रूपये की - पर मन तो खुश होता है ही. मेरे को भी याद है, कि जब हम बनारस के बड़ी पियरी मोहल्ले में रहा करते थे तो एक बार पापा ने मेरे नाम से २ रूपये की लाटरी खरीदी थी, और उसमें शायद १० रुपये निकले थे - वो पापा का उस मोहल्ले के नुक्कड़ के पान वाले को (जो कि लाटरी विक्रेता भी था) अपना लकी लाटरी का टिकेट दिखा के वो १० रूपया लेना आज भी याद है. इस घटना को बीते बाईस साल हो गए.

फिर एक बार दैनिक जागरण की बाल प्रतियोगिता के लाटरी से चुने हुए विजेता के तौर पे मनीआर्डर से भेजे हुए वो २० रुपये का वही  नोट आज भी बनारस में घर में मेरी किसी डायरी में सुरक्षित रखा है. जबकि इस घटना को शायद सत्रह साल हो गया है. अब इसे सनक कहो या पागलपन - ये तो बस ऐसे ही होता है. आदमी कितना भी बड़ा हो जाए - पर दिल तो बच्चा है. वो तो बस अपने अन्दर की ना जाने कौन सी उधेड़बुन में हमेशा उलझा रहता है. उसको कभी पैसे रुपये या आराम शौक ... वगैरह.. से नहीं .. बल्कि बस कुछ भी ऐसा करने में मजा आता है.. बस जिसका कोई कारण नहीं होता है. 

तो जब आदमी खुश होता है, तो वो अपनी खुशी अपने सबसे नजदीकी इंसान से बांटना चाहता है. वो शायद कभी ये बता ना पाए कि उसमें ऐसा क्या ख़ास बात है, कि वो इस ख़ुशी को सबसे बांटने के लिए इस तरह से उत्सुक है. ये इंसान का वो भोला और मासूम रूप होता है. हमको अपने को खुशनसीब समझना चाहिए कि कम से कम हम किसी एक इंसान के इतने करीबी तो बन सके. वरना साथ रहने और ढेर सारा समय साथ गुजरने से भी कभी कभी हम दूर रहते हैं. "कभी दूर कभी पास" - और कभी कुछ लोग दूर रह के भी काफी पास पास और करीब महसूस करते हैं.  - ये कुछ उसी प्रकार से है, जैसे कि बच्चा जब छोटा होता है, तो वो कोई एकदम साधारण सी चीज़ देखता है, और अपने माँ बाप को उस चीज़ की तरफ इशारा कर के उनका ध्यान उस तरफ खींचना चाहता है.. और माँ  बाप उस बात पे खूब खुश हो के उसकी खुशी में शामिल होते हैं. बच्चा और भी खुश हो जाता है. 

Wednesday, January 13, 2010

आज कल इस तरह के निश्छल व्यावहार की कितनी कमी सी है

Ganga Aarti at Varanasi ghats,Image via Wikipedia
हमारे एक बंगलोर के ऑफिस के सहकर्मी इलाहाबाद से गया जाने के वक़्त - प्रोग्राम में कुछ बदलाव की वजह से सुबह से शाम तक के लिए अचानक बनारस पहुंचे. वो खुद थे, उनकी धर्मपत्नी और माता जी  भी उनके साथ थीं. करीब सुबह के वक़्त जब वो बस से बनारस के रास्ते में थे तो उन्होंने अपने प्रोग्राम से मुझे फ़ोन के जरिये अवगत कराया. शाम को उसी दिन उनको मुगलसराय से गया के लिए ट्रेन पकडनी थी. वो लोग वहां पिंड-दान करने जा रहे थे. वैसे बनारस का उनका प्रोग्राम कोई पक्का नहीं था. तो जब  उन्होंने इलाहाबाद से मेरे को अपना ये बदला हुआ प्रोग्राम बताया तो मैंने कहा कि तुम लोग वहां दिन में बनारस में मेरे घर चले जाओ. मम्मी हैं हीं बनारस में. 

ध्यान देने की बात ये थी कि वहां घर पे सिर्फ मम्मी और बुआ जी (जो कुछ दिनों के लिए आई हैं) थी, और मैंने उनसे उनका कोम्फोर्ट भी नहीं पुछा था. कि इस तरह एक दिन के लिए अगर अचानक कोई आ जाए तो उससे कोई असुविधा तो नहीं होगी. बस माँ बाप पे बच्चों का यही विश्वास .. ना जाने ये क्या चीज़ होती है. मेरा मम्मी को फ़ोन पे बताना था.. कि बस मम्मी तुरंत हरकत में आ गईं. मेरे को कितना अच्छा लगा कि आप पूछिए मत. कल को मेरी शादी हो जायेगी और इसतरह से किसी दोस्त को घर पे अचानक बुलाना होगा, तो क्या वही सहयोग प्राप्त हो सकेगा?

मैंने मम्मी से पूछ के उनको नंबर दे दिया. वैसे मैं तो लोगों को घर पे बुलाने से चूकता नहीं. यही कारण है, कि यहीं घर से इतना दूर भी यहाँ मेरी  महफ़िल जमी ही रहती हैं.  तो सब कुछ सेट हो गया... फिर वो बताये अनुसार वहाँ बनारस में शिवपुर स्थित हमारे घर पे पहुँच गए. मम्मी और बुआ ने उन लोगों को उनकी इच्छानुसार विश्वनाथ बाबा और गंगा जी का दर्शन भी करवा दिया. बुआ और मम्मी की मेहमान-नवाजी देख के वो दोस्त एकदम गदगद होगया . वैसे भी उनका भाग्य था.. वरना हम सब तो बस ऊपर वाले के हाथ की कठपुतली हैं. शाम को मम्मी और बुआ ने ससम्मान उनको मुगलसराय के लिए साधन पे बैठा के विदा किया. उसके बाद एस.एम्.एस के जरिये मुझे संछेप में बता दिया . दोस्त ने फ़ोन पे मुझे आभार व्यक्त किया. बुआ जी और मम्मी के लिए वो बस .. कुछ कह नहीं पा रहा था.. जब इंसान को सच्चा स्नेह - बिना आडम्बर का व्यावहार मिलता है - तो यही होता है...आजकल शायद लोग एक दूसरे का इस तरह सम्मान नहीं करते हैं. वहीँ एक अजनबी शहर में  जब इस तरह का सम्मान मिले तो लोगों को आश्चर्य हो - तो ये बड़ी बात नहीं है. वाह!! रे प्रभु...

मेरे को ये नहीं समझ में आता है, कि आज कल इस तरह के निश्छल व्यावहार की कितनी कमी सी है. वरना.. सही मायने में जब भी कोई आता है, तो हमारे घर में  कभी पकवान नहीं बनाया गया होगा - जो भी घर में उपलब्ध है, प्यार से वही मिल बाँट के खाया गया होगा.  आज एक बार फिर मेरा विश्वास इस बात पे और प्रबल  हो गया है कि पैसे से नहीं अपितु सच्चे प्यार से उनको जो खुशी मिलती है, उसका कोई बराबरी नहीं है. लोग अब दूर रहते हैं, उनके पास वक़्त नहीं है, कि वो शनिवार और रविवार को लोगों से मिले. सबके लगता है, कि शायद दूसरे पसन्द ना करें. हम बहुत दूर चले जा रहे हैं. ना जाने किस ओर, किस चीज़ की तलाश में.

जब हम लोग छोटे थे, तब भी हमारे पिताजी लोग , अंकल लोग, सुबह से शाम की ड्यूटी बजाते थे, पर फिर भी, सन्डे को पास - पड़ोसी - सगे संबंधी - रिश्तेदार - नातेदार के लिए वक़्त निकाल ही लिया करते थे. मेरे को याद नहीं कि मेरे घर में कभी किसी के भी आने पे - चाहे वो बता के आये हों या बिना बताये - कि कभी किसी ने जरा भी नाक - भों सिकोडी हो... शायद घर से सीखी हुई यही सब आदत आज घर से इतना दूर रहते हुए भी जीवन जीने का सहारा बनी हुई है.  अपने घर के सभी बड़ों को सत सत नमन.


Monday, December 21, 2009

कुछ चीजें ध्यान रखने की, जब आप किसी को खाने पे घर बुलाये

The Gynecologist Dinner Guest [cartoon]
The Gynecologist Dinner Guest [cartoon] (Photo credit: methodshop.com)


  1. आपने किसी को बुलाया खाना बनाने में मदद करने में - वो आपके मित्र हैं - उन्होंने अपनी सबसे कीमती चीज़ दी है. उनके साथ आपने कैसे आदान प्रदान किया. यहाँ से शुरुवात होती है. मेहमानों के सामने तारीफ़ को अपने सभी सहयोगियों से बांटना कभी नहीं भूलना चाहिए.
  2. मेहमान ने घर में प्रवेश किया. तो आप जो भी कर रहे हैं, या तो किचेन में हैं या कहीं और - आप किस तरह से मुस्कुरा के .. अपने हाव - भाव से किस तरह से उनका अभिवादन करते हो. एक गहरी मुस्कराहट और नजरों से नजरों को मिला के.
  3. आपके मेहमान अगर अपने बच्चों के साथ आये हैं, तो उनके बच्चों के बारे में पूछना चाहिए. वो क्या कर रहे हैं. और आपको कोशिश करनी चाहिए कि आप उनके बच्चों को उनके नाम से बुलाएं.. अगर आपको मालूम हैं, कि बच्चे छोटे हैं, तो घर के टूटने वाले सामानों को पहले ही हटा दे - जिससे कि बच्चे के माँ बाप को कोई सामन ना टूट जाए इस डर से बच्चे के पीछे - पीछे ना भागना पड़े. 
  4. अगर डिनर पर बुलाया है, तो ये ज़रूर ध्यान दें कि बहुत देर ना हो जाए खाने में - सबका खाने का एक समय होता है. कोशिश ये रहे कि खाना समय पे रेडी रहे और आप भी सबके साथ हंसी मजाक में बातचीत में सम्मिलित हो सकें. अच्छा हो कि पहले ही पूछ ले कि कब खाना ठीक रहेगा सबी सहूलियत के अनुसार. 
  5. खाने के पहले चाय - कॉफ़ी के वक़्त कोशिश करिए कि रोजाना से हट के हो कुछ . बहुत भारी ना हो वरना खाना नहीं खा पायेंगे लोग. कोशिश करिए कि कुछ बहुत ही हल्का डिश हो, जो कि आपने खुद बनाया है - थोडा ही हो.. पर लोग जरूर पसंद करेंगे, क्योंकि आपने बनाया है. मेहमान लोग भी इससे प्रभावित होंगे और बातचीत में आपका इस विशेषता पे भी चर्चा हो जायेगी. आखिर आप ख़ास हैं. आप इन्टरनेट या मैगजीन से देख के कुछ ट्राई कर सकती हैं. 
  6. अपने बारे में ही बात नहीं करनी चाहिए. आपको अपने मेहमानों के शौक़ और पसंद के बारे में चर्चा करनी चाहिए. अगर मेहमान आपके पति के बॉस हैं, तो काम काज के बारे में ज्यादा चर्चा करने से या फिर अनायास की प्रशंशा करने से बचना चाहिए.
  7. अपने पति के बारे में - वो घर पे क्या करते हैं क्या नहीं करते हैं - हल्का फुल्का मजाक वगैरह पूरी सूझ बूझ के ही साथ करना चाहिए. कोशिश कीजिये की ऐसी कोई चर्चा ना हो जो कि आपके पति को पसंद नहीं है. बाहरी लोगों के बीच में जबकि लोग आपकी बातों का समर्थन कर रहे हैं - उस वक़्त किसी बहाव में बहने के बजाय, एक दायरे में ही मजाक करना चाहिए. 
  8. खाना खाते वक़्त ये ध्यान दें कि आप भी साथ में सबके साथ खाने बैठी हैं. व्यायवस्था  ऐसी करें कि आप बीच में ही सही पर सबके साथ ही खाना खाएं. 
  9. अच्छा हो कि खाते वक़्त किसी के कम और ज्यादा खाने पे कोई वक्तव्य देने से बचे. खाने में क्या क्या है, शुरू में ही किसी चर्चा के बहाने बता दें - लोग अपनी पसंद के अनुसार तैयार रहेंगे. बहुत चीज़े मेनू में रखने के बजाय क्वालिटी के बारे में सोचें. 
  10. डेजर्ट में थोडा कम स्वीट या फिर स्वीट्लेस - स्वीट ही रखे - आजकल लोग चीनी अवोइड करते हैं. तो कुछ अलग भी हो जाएगा. अंत में सौंफ जरूर रखें.
  11. विदा के वक़्त दरवाजे तक छोड़ने जरूर आयें - और ये कहना ना भूलें कि बहुत अच्छा लगा उनके आने से और आपका भी दिन अच्छा बीता. 
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