मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"

Wednesday, January 16, 2013

बनारस याद आता है

Varanasi Street
Varanasi Street (Photo credit: bestarns)

Kachauri-jalebi, #samosas, lassi, rabari, thandai -- the list of mouth-watering #food available on the #streets of #Varanasi is endless.

मैं ये सब मिस करता हूँ. वो चाय पीना, वो दूकान के किनारे खड़े होकर गांडीव पढना. फिर जब बगल से थानेदार की गाडी गुजरे तो बगल हो लेना. जब से शहर छूटा है, सब कुछ भूला सा लगता है.

मैं पहले सोचता था, कि ये सब मेरे ही साथ हो रहा है, पर औरों को देखता हूँ, तो लगता है, कि मैं फिर भी ठीक हूँ और लोग तो अपने शहर से निकले तो फिर किसी शहर के ना हो सके. जब कोई नया शहर मेरे को अपनाता है, तो मैं सोचता हूँ, कि जय हो बनारस. तुमने मुझे जीना सिखलाया - उन विपरीत परिस्थितियों में भी किसी कि शिकायत ना करना सिखलाया. तुमने मुझे ऐसा बनाया ....

वो मुझे भूल ही गया होगा, इतनी मुद्दत कोई खफा नहीं रहता।

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