मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"


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Monday, July 22, 2024

पाँच विशेषतायें

 

बच्चा की पाँच विशेषतायें

  1. खाते हैं तो बहुत ही खाते हैं। और बहुताय खाते हैं। हम ग़रीब हो सकते हैं, भूखे नहीं।
  2. हमने अपनी पुरानी / पैदाईशि विशेषता बरक़रार रखा है। (ये हमको सबसे ज़्यादा पसंद है)
  3. जो जैसा है, उसके साथ वैसे ही adjust कर लेते हैं।
  4. हेल्थ conscious हैं।
  5. हम व्यावहारिक नहीं होते होते रह जाते हैं। हम व्यावहारिक नहि हैं।

सोनू की पाँच विशेषतायें

  1. हमेशा नया सीखने की चाहत आज भी बनी हुई है। (ये विशेषता सबसे ज़्यादा पसंद है)
  2. स्वास्थ्य को लेके बहुत सजग रहते हैं।
  3. TV और न्यूज़ और सिनेमा देख के समय बेकार नहि करते।
  4. किसी भी तरह के दुर्व्यसन, जैसे धूम्रपान, मद्यपान से हमेशा दूर रहे।
  5. स्वाभाव से बहुत संतोषी हैं। किसी भी चमक को देख के अनावश्यक आकर्षित नहीं होते हैं।

शिनू की पाँच विशेषतायें

  1. अपने पति को उन्ही के अनुसार अजस्ट की हैं।
  2. खाने को ले के conscious हैं। नियमित हैं। शरीर और स्वास्थ्य को ले के सजग। (ये विशेषता सबसे ज़्यादा पसंद है)
  3. अपने अंदर की कोई भी चीज़ को इक्स्प्रेस नहीं कर पाते हैं।
  4. अच्छा खाना खाना पसंद है।
  5. नई नई चीज़ें ट्राई करना अच्छा लगता है।

December 30, 2017

बनारस: हमारे बचपन की यादें और सकारात्मकता

बचपन में हमने जो अनुभव किए, वे हमारे जीवन पर गहरा असर डालते हैं, और बनारस में हमारे लिए स्वीकृति का स्तर हमेशा उच्च रहा है। मुझे आज भी याद है कैसे हमारे कॉलोनी के डीडी ने बायपास पर बिजली बहाली के लिए धरना प्रदर्शन किया था।

यह घर पर हमारे लिए एक यात्रा के समान था जब हमें मोमबत्तियों या यहां तक कि पेट्रोमेक्स की रोशनी में पढ़ाई करनी पड़ती थी। समय के साथ और आर्थिक स्थिति में सुधार होने पर हमने इन्वर्टर खरीदा, और यही सब कुछ था।

पिछले 40 सालों में, लगता है कि सुधार न्यूनतम ही हुआ है, सिवाय इसके कि बिजली कटौती कम हो गई है। हजारों रातें हमने हाथ के पंखे और खुली छत पर बिना किसी शिकायत के बिताई हैं। अब हम गंभीर टैक्स भी भरते हैं, फिर भी इंफ्रास्ट्रक्चर हमेशा मेट्रो शहरों के लिए ही बनाया जाता है।

यहां तक कि नए मुख्यमंत्री भी इस जीवन के हिस्से को नजरअंदाज करते हैं और मीडिया बाजी पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। यह सिस्टम इतना भ्रष्ट है कि आम जनता की समस्याओं को सुलझाने की बजाय केवल दिखावे पर जोर दिया जाता है।

बनारस में रहकर हमने कई चुनौतियों का सामना किया है, लेकिन इन कठिनाइयों ने हमें और भी मजबूत और सहनशील बनाया है। हमें यह समझना चाहिए कि बदलाव धीरे-धीरे होता है और हमें सकारात्मक रहकर अपनी आवाज उठानी चाहिए। केवल इसी तरह हम अपने शहर को और बेहतर बना सकते हैं।

बनारस की धरती पर जीवन जीना एक अनूठा अनुभव है और हमें गर्व है कि हम इस पवित्र नगरी का हिस्सा हैं।


आभार - बंटी भैया की डायरी से (मई 2021)

संस्मरण

 

संस्मरण

बड़े जद्दोजहद के बाद, अत्याधुनिक तकनीकों का सहारा लेते हुए हमने 8 मई का अपॉइंटमेंट लिया कोविड वैक्सीनशन के लिए नरपतपुर सेंटर पे। गूगल से स्थान का रास्ता समझा और सुबह पेट भर नाश्ता कर के निकल पड़े विजय अभियान हेतु। 30-40 मिनट की मोटरसाइकिल यात्रा के बाद निर्धारित स्थान पर ठीक 10 बजे सुबह हाजिर हो गए।

पता चला कि वहां उस समय तक न वैक्सीन आई थी न वैक्सीन लगाने वाले। अपने आप को देश की राजधानी का वाशिन्दा मानते हुए, इस जगह के पिछड़ेपन का कारण लोगों की लापरवाही को बताते हुए मन ही मन बहुत कोसा उस अस्पताल से सिस्टम को।

अंततः 10:45 पर वैक्सीन आई और बेतरतीब ढंग से लंबी लाइन लग गई धक्का-मुक्की के साथ, क्योंकि एक घंटे में बहुत लोगों का जमावड़ा हो गया था वहां पे। वहां 2 कमरों में वैक्सीन लग रही थी। हम एक में गए जहां कम भीड़ थी, फटाफट वैक्सीन लगवाई और विजयी मुद्रा में बाहर निकल लिए, दूसरे कमरे की भीड़ में घुसे हुए लोगों को देख मुस्कुराते हुए।

अब सर्टिफिकेट की प्रतीक्षा थी जिसे मित्रों को दिखा के छोटी-मोटी जंग जितने का प्रमाण देकर फ़र्ज़ी वाहवाही लूटी जाए और बाकियों को वैक्सीन लगवाने के महत्व को बताया जाए। शाम ढली पर सर्टिफिकेट न आया। चिंता बढ़ी। तब तक SMS आया कि आपके मन कर दिए जाने के कारण आपका वैक्सीनशन न हो पाया श्रीमान। साला दिमाग भन्ना गया। गूगल से वहां के इंचार्ज का नंबर निकाल के उन्हें फ़ोन लगाया और बरस पड़े। फिर उनके रिस्पांस से समझ आया कि उन्हें तो कोई फर्क ही नहीं पड़ा। उल्टा उन्होंने नया ज्ञान पिलाया कि भाई आपने 45+ वाले कक्ष में टीकाकरण करवाया था इसलिए गलती आपकी।

आगे के बाकी वार्तालाप में मेरी तरफ से विनम्रता का अतिरिक्त पुट रहा। अंत में ये नया की अब मैं फिर से कोवैक्सिन का अपॉइंटमेंट उसी सेंटर पे लूं तब वे सर्टिफिकेट दे देंगे। वो दिन था और आज का दिन मैं लगातार देखता रहा लेकिन साला कोवैक्सिन रूठ गया और लगातार कोविशील्ड ही आता रहा वहां पे। थक-हार कर मैंने दूसरे सेंटर पे कोवैक्सिन की बुकिंग ली।

आज सुबह बालों में कंघी कर के वाहन पहुँचा और नर्स के वाहन से हटने की प्रतीक्षा करता रहा। जैसे वो हटी, मैंने ऑपरेटर को संक्षेप में अपनी समस्या बताई और उससे निवेदन किया कि वो बिना वैक्सीन लगाए उसमें कन्फर्म कर दे। बेचारा सज्जन व्यक्ति था और मान गया। इस प्रकार फुल्ली ऑटोमेटेड सिस्टम में 12 दिन के अथक प्रयास और सहज मानवीय संवेदना के परिणाम स्वरूप मैं प्रथम डोज़ का प्रमाणपत्र पा सका।

ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं। धन्यवाद।


आभार - मनीष सिंह (बब्बू भैया) की डायरी से (मई 2021)

Sunday, May 10, 2020

कोविड - एक वायरस है

कोविड  कर के एक वायरस है. वो कहाँ से आया है, किसी को नहीं पता है. वो बेचारा क्या खता पीता है. ये, भी किसी को नहीं पता.

पर उसके आने से देश दुनिया में एक समता सी आ गई है. बस सब लोग बहुत शांति से रहने लगे हैं. सभी गरीब और कमजोर लगने लगे. अमेरिका को अब ऐसा कोई नया सिनेमा बनाने की जरूरत नहीं, जिसमे वो पूरे विश्व को बचा रहे हो.

सब लोग मास्क लगते है. कोई बहार नहीं जाता है. ५ साल का बच्चा अब वायरस का मतलब समझने लगा है. हम तो जब कंप्यूटर चलना सीखे तब समझे क्वारंटाइन क्या होता है. उस वक़्त कंप्यूटर के वायरस को एंटी वायरस क्वारंटाइन करता था. कंप्यूटर के मालिक को नहीं. पर अभी ये वाला जो  वायरस है, उसमे वायरस को धारण करने वाले को भी क्वारंटाइन करते हैं.

लोगों को मरना पड़  रहा है. बहुत ही हड़बड़ाहट है. लॉक डाउन  है. स्कूल बंद है. पुलिस और डॉक्टर जो फ्रंट पे रह के हम सबको बचा रहे हैं, उनको भी अपने जान देनी पड़  रही है. ऐसा पहले नहीं हुआ.

आशा करते हैं, आने वाले समय में ईश्वर की कृपा से सब ठीक हो जाएगा. 

सम्पत की उलझन

जब उस दिन रास्ते में संपत से भेंट हुई, तो वो जल्दी में कन्नी काटता हुआ दिखाई दिया। मैंने भी कहाँ छोड़ना था उसे। अरे हम कोई फेसबुक थोड़े ही न हैं कि  देखो न देखो तुम्हारी मरजी। बस सस्ती काफी की दूकान के आगे बैठ के शुरू कर दी पंचायत। थोडा खंगाला तो पता चला कि  बन्धु इसलिए मुहं लटकाए हैं, कि उनको लगता है,कि कोई उनकी बात नहीं समझता और वो जो भी कुछ करते हैं, उससे किसी न किसी को दुःख जरूर पहुंचता है। 

संपत कोई अकेला नहीं है. बहुत से आपको मिल जायेंगे। ये बड़ी ही विडम्बना है, कि हमें खुद ही नहीं पता कि आखिर हमें क्या चाहिए। ये ही सबसे बड़ी समस्या की जड़ है। ये मैं नहीं कह रहा, बल्कि कुछ दार्शनिकों ने कहा है, कि बस बढ़ते चलो रास्ता मिल जायेगा. स्थिरता किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती है. जब भी कभी लगे कि आप दोराहे पे खड़े हैं, तो बस एक रास्ता चुनो और तेजी से उस रास्ते पे चल पड़ो। और इस भागम दौड़ में मिली १० असफलता, वहीँ पुरानी जगह खड़े रह के बेहतर विकल्प की आशा से लाख गुना बेहतर है।

इस हडबडी में अगर कुछ सही या गलत हुआ और अगर कोई दूसरा इससे आहात होता है, तो होने दो. जो आहत होता है, कसूर उसी का है. किसी विद्वान् ने सही कहा है - 'कोई बिना आपकी मर्जी के आपको परेशान नहीं कर सकता'. लेकिन अगर आपको ये लगता है, कि  आप इसके लिए जिम्मेदार है, तो इसका मतलब ये है, कि आपको अपने ऊपर भरोसा नहीं है. जब भरोसे की कमी होती है, तो हजार समस्याएं जन्म लेने लगती है। और फंस जाते हैं आप इस गड़बड़ झाले मे। 





Sunday, January 20, 2013

'का गुरु! हो गईला न बड़ा - मजा आवत ह'

grown up
Grown up (Photo credit: tvlistings.zap2it.com)
तब हम बड़े न हुए थे, छोटे बच्चे थे, लम्बाई भी कोई ज्यादा नहीं थी कि लोग बाग़ छोटा न समझें. बहुत जल्दी थी, बड़ा होने की. क्योंकि, अक्सर ऐसा होता था - कि उमर में बड़े भइया, चाचा या फिर पड़ोस में देख के लगता था, कि बड़ा हो जाऊं, तो बस फिर कभी डांट नहीं पड़ेगी.. राय देने की लत तो शुरू से ही थी, पर कभी किसी ने भाव नहीं दिया, छोटा होने के ये सब नुकसान समझ में आते थे... कोई भी काम पड़ा, तो सबसे छोटा होने की वजह से सीधे सबके आर्डर का भरपूर पालन करना पड़ता था.. बड़ी खीज होती थी... लगता था, कब बड़े होंगे.. समय मानो कितना धीरे - धीरे बीत रहा था...

और अब बड़े हो गए हैं। बड़े होने का एहसास होते ही वो पुराना बचपन मानो दूर से मुह चिढ़ा के कह रहा हो। 'का गुरु! हो गईला  न बड़ा - मजा आवत ह' - अरे काहे का मजा यार - "जब आप छोटे होते हैं तो बड़े होना चाहते हैं, जब बड़े होते हैं तो छोटे होना चाहते हैं।" मन करता है, कि  फिर से कोई डांटे - काम कैसे सही तरह से किया जाता है बताये। और जब गलती हो, तो साथ में खड़ा हो और फिर उसी बचपन की तरह कहे - "गिरते हैं शाह सवार ही मैदाने जंग में, वो तिफ़्ल क्या गिरे जो घुटने के बल चले " अब तो छोटी सी गलती पे मजा लेने वाले ज्यादा हैं और हितैषी कम। कम उम्र में हमारी हर बात पे ध्यान दिया जाता था। बड़े हो जाने  पे जब तक आप गलती नहीं करते तब तक कोई आपकी और ध्यान नहीं देता। वाह रे दुनिया का बड़प्पन! जैसे नींबू के शरबत में आर्टीफीशियल फ्लेवर होता है जबकि बर्तन धोने के लिक्विड में असली नींबू डालने का दावा करते हैं। अरे मैं कहता हूँ, कहे किसी की गलती पे हंसिये मत, उसे शर्मिंदा मत करिये बल्कि गले लगा लिजीए । किसी को गले लगाना  सर्वोत्तम उपहार है - एक ही साइज़ सभी को फिट आता है और एक्सचेंज करने में भी कोई समस्या नहीं होती। और याद रखिये लोग आपकी मान्यता का विरोध कर सकते हैं पर आपके प्रेम का नहीं। भगवान हमारे हांथों से ही अपने बच्चों को गले लगाता है।

उम्र के साथ साथ प्रेमिका और शादी की बाते भी उठाने लगती हैं। अगर आपकी कोई प्रेमिका नहीं है तो आपके जीवन में कुछ कमी है, लोग ऐसा आपको बताएँगे। और अगर आपकी कोई प्रेमिका है तो आपके जीवन में कुछ नहीं है ऐसा आपको एहसास होगा। पर सौ बात की एक बात है, कि  आप परेशान न हों और अपनी परेशानियों से दूर न भागें, क्योंकि जब वे आपको पकड़ेंगी तब आप उनसे भागते-भागते थक चुके होंगे। अब्राहम लिंकन ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति के चरित्र की दृढ़ता आंकना चाहते हों तो उसे शक्तियां और अधिकार दे दें। - मैं कहता हूँ, कि यदि आपको किसी का कुछ भी आंकना है तो उसको एक प्रेमिका दे दें जो कि बाद में उसकी बीवी बने। शादी वह क्षण है जहाँ आप यह नहीं कह सकते - "चलो सब कुछ भूल जाते हैं".


योग्यता आपको शिखर तक ले जा सकती है पर आपका चरित्र आपको वहां बनाये रखता है। किसी भी संवाद में सबसे ज़रूरी है वह सुनना जो कहा नहीं जा रहा हो। अपने कार्यस्थल पर हमें उनके प्रति आदर और समर्पण दिखाना चाहिए जो उपस्थित नहीं हैं, इस प्रकार हम उनका विश्वास प्राप्त कर लेते हैं जो उपस्थित हैं। इसका मतलब ये नहीं कि आप झूठी प्रशंशा कीजिये।  

इन दिनों हम ऐसी चीज़ों को खरीदना चाहते हैं जिनकी हमें ज़रूरत नहीं हैं, ऐसे धन से खरीदना चाहते हैं जो हमारे पास नहीं है, और उन लोगों को दिखाने के लिए खरीदना चाहते हैं जिन्हें हम पसंद नहीं करते। वाह रे मुर्खता! मूर्ख लोग जब एक समूह बनाकर खड़े हों तो उनकी ताक़त को कम न आंकें। और हाँ किसी को भी अपने जैसा बनाने की कोशिश न करें। भगवान जानता है कि आप जैसा एक ही काफी है। फिर भी कहूँगा कि
चीज़ों के उजले पक्ष की तरफ़ देखने से आज तक किसी की भी आँखें ख़राब नहीं हुईं और जैसा कि  एलिअनोर रूजवेल्ट ने कहा है कि आपकी अनुमति के बिना कोई भी आपको छोटा नहीं बना सकता तो बस बड़े होने पे इतना भी गम मत करिए। जरा उस शराबी के बारे में विचार करिए जो कि वही सब बकता है जो शराब न पीनेवाले सोचते हैं।

मस्त रहिये। एक दिन आएगा जब आपकी ज़िंदगी आपकी आंखों के सामने एक फ़िल्म की तरह दिखेगी, इसलिए एक बेहतर ज़िंदगी जियें। इटालियन कहावत है कि - शतरंज का खेल ख़त्म हो जाने पर राजा और पैदल सिपाही एक ही डब्बे में चले जाते हैं। अतः हमें सदैव उदार और दयालु होना चाहिए - चार चींटियाँ जंगल से गुजर रही थीं। उन्होंने एक हाथी को आते देखा। पहली चींटी बोली - "इसे ख़त्म कर देते हैं"। दूसरी चींटी बोली - "इसकी टांग तोड़ देते हैं"। तीसरी चींटी बोली - "इसे उठाकर फेंक देते हैं"। चौथी चींटी बोली - "इसे जाने दो यार, ये अकेला है और हम चार"।

Friday, January 18, 2013

इन्टरनेट - एक साधन है पर साध्य नहीं।

A book scanner at the Internet Archive headqua...
A book scanner at the Internet Archive headquarters in San Francisco, California. (Photo credit: Wikipedia)
कुछ लोग कहते हैं कि  आजकल का नया जमाना है। लोग किताब नहीं पढ़ते बल्कि वो जानकारियों के लिए इन्टरनेट पे ज्यादा आश्रित हैं। अब इन दोनों जरिये से जानकारी ली जा सकती है। हाँ, ये अब रीडर के खुद के ऊपर निर्भर करता है, कि  वो किस जरिये से किस तरह की जानकारी लेता है। 

इन्टरनेट पे तमाम जानकारियां ऐसी हैं, जिसको लोगो ने अपने अनुभव के आधार पे लिख डाला  है। अब अनुभव सही और गलत भी हो सकते हैं। अब जैसे मैं जब इस ब्लॉग को लिख रहा हूँ, तो ये एक प्रकार से इन्टरनेट पे मेरे अनुभव से जुड़ा हुआ ही है। वहीँ पर किताब एक ऐसी चीज़ है, जिसे पूरी तरह से रिसर्च के बाद लिखा जाता है। कई लोग उसका रिव्यु करते हैं और तब कहीं जा के कोई किताब मार्किट में आती है। 

किताब को पब्लिश करने से लेकर स्टोर तक पहुँचाने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल और अत्यधिक समय लेने वाली है। वहीँ एक नुक्सान और होता है - कि  ऐसे वो तमाम विषय जो बहुत ही जल्द बदल जाते हैं, उनके ऊपर किताब लिख कर बुक स्टोर में पहुँचाना बहुत घाटे का सौदा साबित हो सकता है। जैसे एक उदहारण है, टूरिस्ट गाईड का। एक जनाब ने एक टूरिस्ट किताब बुक स्टोर से खरीदी और उसमे बताये अनुसार पहुँच गए एक तालाब के किनारे जो नार्थ ईस्ट चीन में नार्थ कोरिया के सीमा के समीप था। अब किताब में लिखा था की वहां कोई समस्या नहीं है। पर वो क्षेत्र निषिद्ध क्षेत्र निकला और जनाब को सैनिकों ने पकड़ के 1 महीने की कैद में डाल  दिया। बाद में गाइड ने उनसे क्षमा माँगी। 

वहीँ इन्टरनेट की ख़ास बात ये है, कि  उसके जरिये हम जानकारी को बहुत ही जल्दी उसके रीडर तक पहुंचा सकते है। ऐसे तमाम सब्जेक्ट (उदाहरण - ट्रेवल गाइड etc.) के लिए इन्टरनेट एक अच्छा साधन साबित हो सकता है। आपने अभी पढ़ा भी होगा कि  अब कुछ किताबे भी हैं जो कि सीधे सीधे डिजिटल फॉर्म में ही रिलीज़ हो रही हैं। इसका प्रमुख कारण है - सुगमता। ये बहुत ही अच्छी बात है। उन सारी परखी हुई जानकारियों को अगर कोई हमें  डिजिटल माध्यम से पहुंचा रहा है, तो बहुत अच्छी बात है। धीरे धीरे इसका महत्व बढेगा ही। पर मैं उन तमाम जानकारियों को लेके चिंतित हूँ, जो कि हम आप जैसे तमाम पार्ट टाइम स्वयम्भू लेखक और एडिटर्स इन्टरनेट पे प्रतिदिन पब्लिश कर रहे हैं। नहीं-नहीं मैं क्वालिटी को लेके चिंतित नहीं हूँ। पर होता क्या है, कि सभी जानकारियां पूर्ण नहीं होती। आपस में जुडी नहीं होती। और इन्टरनेट सर्च हमको ऐसी ही तमाम अधूरी कड़ियों की एक सूची देता है और हम उसी में खो जाते हैं। सर्च सुविधा की वजह से हम इन्टरनेट पे ज्यादा आसानी से सर्च करते हैं बावजूद इसके कि हमारे पास उस सब्जेक्ट की एक बेहतरीन किताब घर में है। 

मेरा मानना है कि हमको किताबों की अहमियत को नहीं भूलना चाहिए। जहाँ तक हो सके इन्टरनेट का उपयोग एक इंडेक्स की तरह करना चाहिए और फिर संपूर्ण विस्तृत जानकारी के लिए किताब (हार्ड कॉपी ये डिजिटल कॉपी) पे ही निर्भर होना चाहिए। इन्टरनेट की सुविधा का सही उपयोग करना चाहिए। ये एक साधन है पर साध्य नहीं।

Wednesday, January 16, 2013

बनारस याद आता है

Varanasi Street
Varanasi Street (Photo credit: bestarns)

Kachauri-jalebi, #samosas, lassi, rabari, thandai -- the list of mouth-watering #food available on the #streets of #Varanasi is endless.

मैं ये सब मिस करता हूँ. वो चाय पीना, वो दूकान के किनारे खड़े होकर गांडीव पढना. फिर जब बगल से थानेदार की गाडी गुजरे तो बगल हो लेना. जब से शहर छूटा है, सब कुछ भूला सा लगता है.

मैं पहले सोचता था, कि ये सब मेरे ही साथ हो रहा है, पर औरों को देखता हूँ, तो लगता है, कि मैं फिर भी ठीक हूँ और लोग तो अपने शहर से निकले तो फिर किसी शहर के ना हो सके. जब कोई नया शहर मेरे को अपनाता है, तो मैं सोचता हूँ, कि जय हो बनारस. तुमने मुझे जीना सिखलाया - उन विपरीत परिस्थितियों में भी किसी कि शिकायत ना करना सिखलाया. तुमने मुझे ऐसा बनाया ....

वो मुझे भूल ही गया होगा, इतनी मुद्दत कोई खफा नहीं रहता।

Friday, May 7, 2010

शादी करोगे तो पता चलेगा... हुंह!!

Sister, Brother & MeImage by El_Sol via Flickr
तीन साल बाद वो भूल जाती थीं... अब हम जब क्लास ६ में थे तो वो ९ में थीं, अब भला हम उनके क्लास में तो जा नहीं सकते थे.. बड़ा परेशान करती थीं.. ये भी अजीब आदत थी.. कुछ भी पूछो तो कहेंगी - अभी ६ में हो ना, जब ९ में आओगे तो पता चलेगा. अभी बहुत आसान लग रहा है ना बेटा!! अभी थोड़े समय में पता चलेगा. अभी बोलो मैथ सेकंड (Maths -2) है तुम्हारे  में .. नहीं  ना !! तो जब ९ में ये सब्जेक्ट आएगा तब पता चलेगा. अभी कर लो मजा. 

टुन्ना को आज अनायास ही ये वाक्या याद आता है. टुन्नी उससे तीन साल बड़ी थी.  और ये आम नोंक झोंक इतनी स्वाभाविक थी कि, आज टुन्ना को एहसास होता है - कि जिन लोगो ने अपने जीवन में इस पल को नहीं जिया है, उन्होंने कितना कुछ मिस किया है. 

जब टुन्ना कुछ समय के बाद टुन्नी के क्लास में पहुँचता .. तो हर विषय की किताबों में वो सवाल खोजता जिसका जिक्र टुन्नी अक्सर किया करती थी. पर अब तो टुन्नी ११ में थी. टुन्ना मन ही मन सोचता था, कि काश एक बार ....  वही दूसरी तरफ टुन्नी मजे से टुन्ना को उसी तरह से टोपी पहनाते हुए आगे बढ़ती रही. 

समय ने पलटा खाया. टुन्नी ने डबल ग्रेजुएशन किया. अब टुन्नी ने MBA में दाखिला ले लिया था. वही दूसरी तरफ टुन्ना ने ग्रेजुएशन के बाद एक दूसरे शहर में नौकरी शुरू कर दी. लगा की सब ख़त्म, पर कहानी अभी बाकी है दोस्त. टुन्ना की कंपनी ने काम के साथ-साथ MBA का मौका दिया. बस फिर क्या था, पलक झपकते ही टुन्ना ने दाखिला ले लिया - और अब शुरू हुआ चुनौती का दौर - लेकिन दोनों अलग शहर में थे - तो उनकी बाते फ़ोन पे ही होती थी. किस सब्जेक्ट में कितना आया पूछ लिया करते थे. पर टुन्नी का पलड़ा फिर भी भारी था. आखिर वो फुल टाइम MBA जो कर रही थी. 

लीजिये टुन्नी पहुँची टुन्ना के शहर इन्टर्नशिप करने. टुन्ना से जितना बन पड़ा किया - आखिर उनके पास वर्क एक्सपेरिएंस था... तो टुन्नी के रिज्यूमे अपडेट से ले के जो बन पड़ा किया. जिन्दगी में पहली बार टुन्ना को इतनी ख़ुशी मिल रही थी पर फिर भी वो जब तक ये टुन्नी के मुह से नहीं सुन लेता कलेजे को ठंडक नहीं मिलती. 

इससे पहले की टुन्नी कहीं नौकरी करती उसके पहले अचानक ही टुन्नी की शादी हो गई और वो काफी दूर चली गई. टुन्ना के हाथ से समय निकल चुका था. उसको मालूम था कि अगर वो आज टुन्नी से बोलेगा ... तो टुन्नी तपाक बोलेगी - "शादी करोगे तो पता चलेगा - अभी समझ रहे हो ना कि नौकरी बड़ी चीज़ है.. हुंह!!"
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Thursday, February 4, 2010

छोटी छोटी खुशी के वो पल दो पल

Dinodia.com
Lottery (Photo credit: Internet - Dinodia.com)

अब लाटरी चाहे चार डालर की लगे या चार रूपये की - पर मन तो खुश होता है ही. मेरे को भी याद है, कि जब हम बनारस के बड़ी पियरी मोहल्ले में रहा करते थे तो एक बार पापा ने मेरे नाम से २ रूपये की लाटरी खरीदी थी, और उसमें शायद १० रुपये निकले थे - वो पापा का उस मोहल्ले के नुक्कड़ के पान वाले को (जो कि लाटरी विक्रेता भी था) अपना लकी लाटरी का टिकेट दिखा के वो १० रूपया लेना आज भी याद है. इस घटना को बीते बाईस साल हो गए.

फिर एक बार दैनिक जागरण की बाल प्रतियोगिता के लाटरी से चुने हुए विजेता के तौर पे मनीआर्डर से भेजे हुए वो २० रुपये का वही  नोट आज भी बनारस में घर में मेरी किसी डायरी में सुरक्षित रखा है. जबकि इस घटना को शायद सत्रह साल हो गया है. अब इसे सनक कहो या पागलपन - ये तो बस ऐसे ही होता है. आदमी कितना भी बड़ा हो जाए - पर दिल तो बच्चा है. वो तो बस अपने अन्दर की ना जाने कौन सी उधेड़बुन में हमेशा उलझा रहता है. उसको कभी पैसे रुपये या आराम शौक ... वगैरह.. से नहीं .. बल्कि बस कुछ भी ऐसा करने में मजा आता है.. बस जिसका कोई कारण नहीं होता है. 

तो जब आदमी खुश होता है, तो वो अपनी खुशी अपने सबसे नजदीकी इंसान से बांटना चाहता है. वो शायद कभी ये बता ना पाए कि उसमें ऐसा क्या ख़ास बात है, कि वो इस ख़ुशी को सबसे बांटने के लिए इस तरह से उत्सुक है. ये इंसान का वो भोला और मासूम रूप होता है. हमको अपने को खुशनसीब समझना चाहिए कि कम से कम हम किसी एक इंसान के इतने करीबी तो बन सके. वरना साथ रहने और ढेर सारा समय साथ गुजरने से भी कभी कभी हम दूर रहते हैं. "कभी दूर कभी पास" - और कभी कुछ लोग दूर रह के भी काफी पास पास और करीब महसूस करते हैं.  - ये कुछ उसी प्रकार से है, जैसे कि बच्चा जब छोटा होता है, तो वो कोई एकदम साधारण सी चीज़ देखता है, और अपने माँ बाप को उस चीज़ की तरफ इशारा कर के उनका ध्यान उस तरफ खींचना चाहता है.. और माँ  बाप उस बात पे खूब खुश हो के उसकी खुशी में शामिल होते हैं. बच्चा और भी खुश हो जाता है. 

Wednesday, January 13, 2010

आज कल इस तरह के निश्छल व्यावहार की कितनी कमी सी है

Ganga Aarti at Varanasi ghats,Image via Wikipedia
हमारे एक बंगलोर के ऑफिस के सहकर्मी इलाहाबाद से गया जाने के वक़्त - प्रोग्राम में कुछ बदलाव की वजह से सुबह से शाम तक के लिए अचानक बनारस पहुंचे. वो खुद थे, उनकी धर्मपत्नी और माता जी  भी उनके साथ थीं. करीब सुबह के वक़्त जब वो बस से बनारस के रास्ते में थे तो उन्होंने अपने प्रोग्राम से मुझे फ़ोन के जरिये अवगत कराया. शाम को उसी दिन उनको मुगलसराय से गया के लिए ट्रेन पकडनी थी. वो लोग वहां पिंड-दान करने जा रहे थे. वैसे बनारस का उनका प्रोग्राम कोई पक्का नहीं था. तो जब  उन्होंने इलाहाबाद से मेरे को अपना ये बदला हुआ प्रोग्राम बताया तो मैंने कहा कि तुम लोग वहां दिन में बनारस में मेरे घर चले जाओ. मम्मी हैं हीं बनारस में. 

ध्यान देने की बात ये थी कि वहां घर पे सिर्फ मम्मी और बुआ जी (जो कुछ दिनों के लिए आई हैं) थी, और मैंने उनसे उनका कोम्फोर्ट भी नहीं पुछा था. कि इस तरह एक दिन के लिए अगर अचानक कोई आ जाए तो उससे कोई असुविधा तो नहीं होगी. बस माँ बाप पे बच्चों का यही विश्वास .. ना जाने ये क्या चीज़ होती है. मेरा मम्मी को फ़ोन पे बताना था.. कि बस मम्मी तुरंत हरकत में आ गईं. मेरे को कितना अच्छा लगा कि आप पूछिए मत. कल को मेरी शादी हो जायेगी और इसतरह से किसी दोस्त को घर पे अचानक बुलाना होगा, तो क्या वही सहयोग प्राप्त हो सकेगा?

मैंने मम्मी से पूछ के उनको नंबर दे दिया. वैसे मैं तो लोगों को घर पे बुलाने से चूकता नहीं. यही कारण है, कि यहीं घर से इतना दूर भी यहाँ मेरी  महफ़िल जमी ही रहती हैं.  तो सब कुछ सेट हो गया... फिर वो बताये अनुसार वहाँ बनारस में शिवपुर स्थित हमारे घर पे पहुँच गए. मम्मी और बुआ ने उन लोगों को उनकी इच्छानुसार विश्वनाथ बाबा और गंगा जी का दर्शन भी करवा दिया. बुआ और मम्मी की मेहमान-नवाजी देख के वो दोस्त एकदम गदगद होगया . वैसे भी उनका भाग्य था.. वरना हम सब तो बस ऊपर वाले के हाथ की कठपुतली हैं. शाम को मम्मी और बुआ ने ससम्मान उनको मुगलसराय के लिए साधन पे बैठा के विदा किया. उसके बाद एस.एम्.एस के जरिये मुझे संछेप में बता दिया . दोस्त ने फ़ोन पे मुझे आभार व्यक्त किया. बुआ जी और मम्मी के लिए वो बस .. कुछ कह नहीं पा रहा था.. जब इंसान को सच्चा स्नेह - बिना आडम्बर का व्यावहार मिलता है - तो यही होता है...आजकल शायद लोग एक दूसरे का इस तरह सम्मान नहीं करते हैं. वहीँ एक अजनबी शहर में  जब इस तरह का सम्मान मिले तो लोगों को आश्चर्य हो - तो ये बड़ी बात नहीं है. वाह!! रे प्रभु...

मेरे को ये नहीं समझ में आता है, कि आज कल इस तरह के निश्छल व्यावहार की कितनी कमी सी है. वरना.. सही मायने में जब भी कोई आता है, तो हमारे घर में  कभी पकवान नहीं बनाया गया होगा - जो भी घर में उपलब्ध है, प्यार से वही मिल बाँट के खाया गया होगा.  आज एक बार फिर मेरा विश्वास इस बात पे और प्रबल  हो गया है कि पैसे से नहीं अपितु सच्चे प्यार से उनको जो खुशी मिलती है, उसका कोई बराबरी नहीं है. लोग अब दूर रहते हैं, उनके पास वक़्त नहीं है, कि वो शनिवार और रविवार को लोगों से मिले. सबके लगता है, कि शायद दूसरे पसन्द ना करें. हम बहुत दूर चले जा रहे हैं. ना जाने किस ओर, किस चीज़ की तलाश में.

जब हम लोग छोटे थे, तब भी हमारे पिताजी लोग , अंकल लोग, सुबह से शाम की ड्यूटी बजाते थे, पर फिर भी, सन्डे को पास - पड़ोसी - सगे संबंधी - रिश्तेदार - नातेदार के लिए वक़्त निकाल ही लिया करते थे. मेरे को याद नहीं कि मेरे घर में कभी किसी के भी आने पे - चाहे वो बता के आये हों या बिना बताये - कि कभी किसी ने जरा भी नाक - भों सिकोडी हो... शायद घर से सीखी हुई यही सब आदत आज घर से इतना दूर रहते हुए भी जीवन जीने का सहारा बनी हुई है.  अपने घर के सभी बड़ों को सत सत नमन.


Monday, December 21, 2009

कुछ चीजें ध्यान रखने की, जब आप किसी को खाने पे घर बुलाये

The Gynecologist Dinner Guest [cartoon]
The Gynecologist Dinner Guest [cartoon] (Photo credit: methodshop.com)


  1. आपने किसी को बुलाया खाना बनाने में मदद करने में - वो आपके मित्र हैं - उन्होंने अपनी सबसे कीमती चीज़ दी है. उनके साथ आपने कैसे आदान प्रदान किया. यहाँ से शुरुवात होती है. मेहमानों के सामने तारीफ़ को अपने सभी सहयोगियों से बांटना कभी नहीं भूलना चाहिए.
  2. मेहमान ने घर में प्रवेश किया. तो आप जो भी कर रहे हैं, या तो किचेन में हैं या कहीं और - आप किस तरह से मुस्कुरा के .. अपने हाव - भाव से किस तरह से उनका अभिवादन करते हो. एक गहरी मुस्कराहट और नजरों से नजरों को मिला के.
  3. आपके मेहमान अगर अपने बच्चों के साथ आये हैं, तो उनके बच्चों के बारे में पूछना चाहिए. वो क्या कर रहे हैं. और आपको कोशिश करनी चाहिए कि आप उनके बच्चों को उनके नाम से बुलाएं.. अगर आपको मालूम हैं, कि बच्चे छोटे हैं, तो घर के टूटने वाले सामानों को पहले ही हटा दे - जिससे कि बच्चे के माँ बाप को कोई सामन ना टूट जाए इस डर से बच्चे के पीछे - पीछे ना भागना पड़े. 
  4. अगर डिनर पर बुलाया है, तो ये ज़रूर ध्यान दें कि बहुत देर ना हो जाए खाने में - सबका खाने का एक समय होता है. कोशिश ये रहे कि खाना समय पे रेडी रहे और आप भी सबके साथ हंसी मजाक में बातचीत में सम्मिलित हो सकें. अच्छा हो कि पहले ही पूछ ले कि कब खाना ठीक रहेगा सबी सहूलियत के अनुसार. 
  5. खाने के पहले चाय - कॉफ़ी के वक़्त कोशिश करिए कि रोजाना से हट के हो कुछ . बहुत भारी ना हो वरना खाना नहीं खा पायेंगे लोग. कोशिश करिए कि कुछ बहुत ही हल्का डिश हो, जो कि आपने खुद बनाया है - थोडा ही हो.. पर लोग जरूर पसंद करेंगे, क्योंकि आपने बनाया है. मेहमान लोग भी इससे प्रभावित होंगे और बातचीत में आपका इस विशेषता पे भी चर्चा हो जायेगी. आखिर आप ख़ास हैं. आप इन्टरनेट या मैगजीन से देख के कुछ ट्राई कर सकती हैं. 
  6. अपने बारे में ही बात नहीं करनी चाहिए. आपको अपने मेहमानों के शौक़ और पसंद के बारे में चर्चा करनी चाहिए. अगर मेहमान आपके पति के बॉस हैं, तो काम काज के बारे में ज्यादा चर्चा करने से या फिर अनायास की प्रशंशा करने से बचना चाहिए.
  7. अपने पति के बारे में - वो घर पे क्या करते हैं क्या नहीं करते हैं - हल्का फुल्का मजाक वगैरह पूरी सूझ बूझ के ही साथ करना चाहिए. कोशिश कीजिये की ऐसी कोई चर्चा ना हो जो कि आपके पति को पसंद नहीं है. बाहरी लोगों के बीच में जबकि लोग आपकी बातों का समर्थन कर रहे हैं - उस वक़्त किसी बहाव में बहने के बजाय, एक दायरे में ही मजाक करना चाहिए. 
  8. खाना खाते वक़्त ये ध्यान दें कि आप भी साथ में सबके साथ खाने बैठी हैं. व्यायवस्था  ऐसी करें कि आप बीच में ही सही पर सबके साथ ही खाना खाएं. 
  9. अच्छा हो कि खाते वक़्त किसी के कम और ज्यादा खाने पे कोई वक्तव्य देने से बचे. खाने में क्या क्या है, शुरू में ही किसी चर्चा के बहाने बता दें - लोग अपनी पसंद के अनुसार तैयार रहेंगे. बहुत चीज़े मेनू में रखने के बजाय क्वालिटी के बारे में सोचें. 
  10. डेजर्ट में थोडा कम स्वीट या फिर स्वीट्लेस - स्वीट ही रखे - आजकल लोग चीनी अवोइड करते हैं. तो कुछ अलग भी हो जाएगा. अंत में सौंफ जरूर रखें.
  11. विदा के वक़्त दरवाजे तक छोड़ने जरूर आयें - और ये कहना ना भूलें कि बहुत अच्छा लगा उनके आने से और आपका भी दिन अच्छा बीता. 

Friday, December 18, 2009

हमारा शौक़ और काम ऐसा होने का है, कि दूसरों को भी खुशी हो उसमें.

Binnenhof
आज अनायास ही मन थोडा अजीब हो गया. एक तो ससुरा जुखाम है कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है. और दूसरा ये कि मैं दुनिया में जिस से भी मिलता हूँ उसके पास टाइम की बड़ी ही समस्या होती है. बड़े ही व्यस्त लोगों के बीच में उठना - बैठना है. सौभाग्य है कि दुर्भाग्य.

कभी इस तरह के मुस्कुराते चहरे को देखता हूँ और सोचता हूँ कि उनकी हालत कैसी है, फिर भी क्या मुस्कराहट है. और वहीँ एक तरफ थोडा नमक और चीनी कम हो जाने से मन खट्टा करने वाले भी लोग हैं. भाई, अगर बहाना बना के दुखी रहना है, तो कोई कुछ नहीं कर सकता है. टाईम निकाल के थोडा खुश भी हो जाइए - हमारे मास्टर कहते थे, कि इससे कुछ घट नहीं जाएगा.


मैंने एक चीज़ गौर की है, कि अगर हम दूसरे काम की तरफ अपना ध्यान नहीं लगायेंगे, तो हमेशा हमारा ध्यान एक तरफ ही खिंचा रहता है. अब ये दूसरी तरफ ध्यान लगाने के लिए बस एक चीज़ की ज़रुरत है, और वो है, कि एक छोटा सा चिरकुट सा काम और शौक ढून्ढ लेने का. जैसे हो सकता है, कि आपने सोचा है, कि बहुत दिन हुआ मंदिर नहीं गए, कोई नई किताब नहीं पढी, या फिर किसी दोस्त को फ़ोन नहीं किया या फिर कुछ भी. बस सोचना क्या है, कर डालिए. येही सब दूसरा काम है.

दूसरी एक बात और जो कि गौर करने कि है, वो ये कि, अगर आप सिर्फ ऐसे काम करेंगे जिससे कि आपको ही सुख मिलता हो, तो बात नहीं भी बन सकती है. हमारा शौक़ और काम ऐसा होने का है, कि दूसरों को भी खुशी हो उसमें. जैसे कि अगर हम किसी की तरफ देख कर जब मुस्कुराते हैं, तो दूसरे भी स्वतः: मुस्कुराने लगते हैं , उसी तरह से कई बार हमारे अच्छे और रोचक व्यावहार से दूसरों को गजब का मजा आता है. और आप भी मस्त हो जाते हैं.



Sunday, December 6, 2009

सब कुछ आपके अच्छे और भले के लिए ही हो रहा है.

Playground in Firehouse Mini Park and, in back...Image via Wikipedia
हम हमेशा से करना चाहते हैं. जैसे कोई किताब लिखना चाहता है, तो कोई कुछ जगहों पे घूमना चाहता है. तो किसी की ख्वाइश होती है, कि वो समाज-सेवा करे, वगैरह-वगैरह.  मेरे एक मित्र है, वो हमेशा जब भी वक़्त मिलता है, कहीं घूमने निकल जाते हैं. मेरे को बड़ा आश्चर्य होता है, कि भला आज की भागती-दौड़ती जिन्दगी में जबकि लोग हमेशा यही शिकायत करते हैं, कि समय नहीं है. भीड़ बहुत है. वहीँ ये जनाब है, कि बस मनमौजी की तरह जैसे ही वक़्त मिला - बस निकल लेते हैं. मैं बहुत कुछ सीखता हूँ उनसे. ऐसा नहीं कि उनके पास ऑफिस में काम कम है, या फिर वो बहुत ही फालतू है. जी नहीं. बहुत ही जिम्मेदारी वाला काम है ऑफिस में उनका भी. काफी दौड़ -धूप भी है. पर शायद अपने लिए इस तरह कुछ वक़्त निकाल लेने से वो काफी तरोताज़ा महसूस करते हैं. और बस वो वही करते हैं. और इससे उनको जो ताकत मिलती है, वो ही उनको खड़ा रखती है.

हम सब लोग हमेशा यही सोचते हैं, कि बस किसी तरह बस आज की समस्या से बाहर आ जाएँ, बाकी बाद में देखेंगे. लगता है कि हम ये मान के बैठे हैं, कि हमारे पास बहुत ही लम्बी ज़िंदगी है. और पूरा विश्वास है, कि कल कोई और समस्या अपना चौड़ा सा मुहं फैलाए उनके सामने नहीं आके खड़ी होगी . जी ये तो एकदम टॉप का सच है, कि समस्या कभी ख़त्म नहीं होती है, बस उसका स्वरुप बदल जाता है. तो ज़रुरत इस बात की है, कि समस्या को नजरंदाज कर के अपने जीने के लिए जो बहुत ही जरूरी है, उसके लिए समय निकालें. वो करें, जो करना आप हमेशा ही चाहते हैं. बड़ी ही शांती मिलती है. किसी ने  सही कहा है , कि अगर हमें ऐसा काम करना हो, जो कि हमें बहुत ही पसंद है, तो हमें उस काम में थकावट का एहसास नहीं होता है. तो अब होता ऐसा है कि हमेशा तो हमें मन माफिक काम मिलेगा नहीं. तो मैं क्या कहुँगा कि जो भी काम और परिस्थितियाँ  बने, बस अपना मन उसके माफिक बना लेना चाहिए. पर अक्सर होता ऐसा नहीं है, हम इसके विपरीत काम करते है. हमें अनायास ही अपनी सारी ऊर्जा उन परिस्थितियों को अपने अनुसार बनाने में खर्च कर देते हैं. और आप ज़रूर मानेंगे कि ऐसा करने से कुछ हासिल नहीं होता है.

एक कड़वा सच है, कि जो भी होता है, वो अच्छे के लिए ही होता है. बस हमें वक़्त लगता है उसे समझने और स्वीकार करने में. और ये वक़्त ज्यादा लगेगा या कम, ये इसपे निर्भर करता है कि हम कितना सकारात्मक सोचते हैं. कोई है, जो कि हमेशा आपके अच्छे के बारे में ही सोच रहा है, ये सारा संसार और आपके अगल-बगल की घटनाएं आपको आपकी सफलता की ओर ले जाने के लिए सारा जुगाड़ कर रही हैं. बस आप एक बार विश्वास भरी नज़र से देखिये तो. सब कुछ आपका अपने है. सब कुछ आपके अच्छे और भले के लिए ही हो रहा है.

Thursday, November 26, 2009

जय जवानी बाबा !

Modern Bishwamitra with Menkazz
Modern Bishwamitra with Menkazz (Photo credit: http://www.everestuncensored.org)

ये बाबा प्रकट नहीं हुए थे. जवानी बाबा का अवतार नहीं हुआ था. कलयुग में बड़ा ही महत्त्व है जवानी का. जवानी बाबा कहते हैं, कि हमें अपनी जवानी का घमंड नहीं होना चाहिए. कुछ लोग जवानी के जोश में पूरी दुनिया को बदल देना चाहते हैं. तो वहीँ जब एक बार जवानी चली जाती है, तो कुछ लोगों का तबका है, जो कि बड़ा ही शोक मनाता है जवानी जाने का. पर जवानी बाबा का कहना है, कि वो आपका साथ तब तक नहीं छोड़ते हैं, जब तक कि आप खुद उनको जाने के लिए नहीं कहते हैं. बोलिए जय जवानी बाबा की.


जो बुरा काम करता है, उससे जवानी बाबा रूठ जाते हैं. कुछ लडकियां अपनी जवानी में बहुत से जवान लड़कों को फांस्ती हैं - वैसे कुछ मनचले भी हवा में बह जाते हैं. जवानी बाबा का आदेश है कि अपने फायदे के लिए जवानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए. अगर आप अपनी जवानी का सही उपयोग करते हैं, तो जवानी बाबा आपको बोनस में लम्बे समय तक जवान रहने का आशीर्वाद देते हैं.

कुछ बूढ़े लोग अपने अगल-बगल की जवानी को देख के इर्ष्या करते हैं - जवानी बाबा का सख्त आदेश है कि अगर वो ऐसा करना बंद नहीं करेंगे तो अगले जन्म में से उनकी जवानी काट ली जायेगी. कुछ लोग अपनी सारी जवानी किसी दूसरे की कहानी सुनने में बिता देते हैं, और उनको पता ही नहीं चलता कि समय कब निकल गया. जवानी बाबा का कहना है, कि ये जवानी का दुरूपयोग है.

सिनेमा में जवानी शब्द को बदनाम किया जा रहा है. इसका जवानी बाबा समर्थक पुरजोर विरोध करते हैं. जवानी को बड़े ही छिछोरे तरीके से प्रस्तुत किया जाता है. इससे जवानी में लोग बहक जाते हैं. एक गाने में तो हद ही हो गई है. गाने के बोल कुछ ऐसे हैं - 'निगोड़ी कैसी जवानी है, ये बात सुने ना मेरी .... बड़ी हरामी है.. ' जवानी बाबा अपनी कसम दिलाते हुए उनके नाम का दुरूपयोग किये जाने को सामजिक पतन की संज्ञा देते हैं.

आइये हम सब मिलकर सच्चे मन से कसम खाएं कि हम जीवनपर्यत्न जवानी बाबा के बताये रास्ते पे चलेंगे. जय जवानी बाबा की.

Monday, November 16, 2009

हमारी समझ और हमारी सोचने की ताक़त और क्षमता हमारी धारणा बनाती है

Robert Fludd, Utriusque cosmi maioris scilicet...Image via Wikipedia

मैं यहाँ कुछ बातें लिख रहा हूँ, कृपया इसे शिक्षा न समझें - और ये बस यूं ही कही जा रही है.. इसमें से जो लगे की आपके काम का है, ले लो.. बाकी समझो कि लिखा ही नहीं गया है. 

टाइम निकाल के थोडा इन्टरनेट पे कुछ अच्छे अंगरेजी और हिन्दी के अर्टीकील पढ़ा करो.. इससे दिमाग का पूरा विकास होता है. जैसे हमें खाना की ज़रुरत होती है, उसी तरह से अच्छी - अच्छी बातों की ज़रुरत होती है पढ़ते लिखते रहने की. ये दिमाग का आहार होता है. अगर उसे आहार न दिया जाए तो वो सही दिशा में सोचना बंद कर देता है. इसीलिए हमेशा कुछ न कुछ पढने की आदत डालो.

नौकरी - या कोई भी छोटा मोटा काम करना हो, तो उसके लिए नए जगह पर अपने को एडजस्ट करना बहुत ज़रूरी होता है. वहां की चीज़ों को अपने देश या शहर की चीज़ों से compare नहीं करना चाहिए. वहां की अच्छे चीज़ों को जल्द ही  अपनाना चाहिए. व्यर्थ की बहस से बचना चाहिए. तभी सम्पूर्ण विकास होगा.

सभी कुछ जो तुम वहां महसूस कर रही हो, उसको सकारात्मक लहजे में  व्यक्त करना सीखो. अपनी बातों को, बहुत ही clarity के साथ कहना बहुत ज़रूरी है. क्योंकि जब हम बाहर होते हैं, नए लोगों के बीच में होते हैं, तो कोई ज़रूरी नहीं कि वो हमारे प्यार और गुस्से के इज़हार को उसी तरह से समझें जैसे कि घर वाले समझते हैं. तो ये बहुत ज़रूरी है, कि हम कोई भी बात स्पष्ट रूप से कहें. ये बहुत ही ज़रूरी है. और अच्छे संबंधों को बनाने में बहुत ही मदद करते हैं.

दूसरों से जब भी बात करो, तो ये ध्यान दो कि उनके द्बारा कही गई बातों में त्रुटियों को नजरअंदाज करते हुए, तुम उनमें से कुछ भी अच्छा निकाल कर उनकी प्रशंशा करो. मैं झूठी प्रशंशा करने की हिमाकत नहीं कर रहा हूँ. अपितु, हर किसी की बातों में चाहे वो उम्र और अनुभव में छोटा हो या बड़ा, अच्छा खोजने की आदत डालने की बात कर रहा हूँ. ये अच्छे संबंधों को लम्बे समय तक बनाये रखने में काफी मदद करती है. कोई ज़रूरी नहीं कि हर दूसरा आदमी हमारी बातों से सहमत हो ही जाए. पर ऐसे मौकों पे हमें जिद से और बहस से बचना चाहिए. भले ही आपके अनुसार आपकी बात सहीं हो - और सामने वाला गलत.

जब हम कभी दूसरों से व्यावहार कर रहे होते हैं, तो हम आशा करते हैं, कि सामने वाला भी हमें उसी गर्माहट के साथ treat करे जैसा हमने किया. पर कई बार ऐसा हो जाता है, कि वक़्त और परिस्थितियों की वजह से, वो आपके साथ वैसा व्यावहार नहीं कर पाता है. अतः थोडा मौका और देना चाहिए. और तुंरत ही सामने वाले के बारे में कोई धारणा नहीं बना लेनी चाहिए. कुछ गलतियों को माफ़ कर देना चाहिए, इससे हमारा संतुलन सही रहता है. और हम तमाम ज़रूरी चीज़ों पे एकाग्र कर पाते हैं. दूसरे की मजबूरियों और विषम परिस्थितियों को बिना उनके द्बारा जिक्र किये बगैर समझ कर उनके प्रति अपने वाद - व्यावहार में परिवर्तन लाने से बहुत अच्छा होता है.

कभी अगर तुमसे कोई गलती हो जाए, तो उसे छिपाने के बजाय उसे स्वीकार करना चाहिए. इससे बड़ी ही शांती मिलती है, और संबंधों में कटुता आने से बचती है. अगर कोई हमसे ओहदे में, संबंधों में, पैसे रुपये में, या किसी भी और तरीके से छोटा या बड़ा हो, उसके सामने अपनी गलती के लिए माफी मांग लेने से आपके इज्ज़त कम नहीं होती, बल्की आप और भी मजबूत और विश्वसनीय हो जाते हैं. असल में जब हम अपनी गलती स्वीकार करते हैं, तो उस वक़्त हम अपने आप को उस की गई गलती के भार से मुक्त कर रहे होते हैं.

परिवर्तन ही संसार का नियम है. आज जो बातें हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, कल उनका महत्व नगण्य हो जाएगा. और जिन बातों को आज हम एकदम ही ध्यान नहीं देते, कल वो बहुत ज़रूरी हो जायेंगी. इसीलिए, ये बहुत ज़रूरी है, कि हर समय, हर छोटी - बड़ी बातों पे बराबर ध्यान दिया जाए. जीवन में संतुलन बनाने में इससे बड़ी ही मदद मिलती हैं. कुछ चीज़ें जो आज हमें फालतू की लगती हैं, या कुछ लोग जो हमें बिलकुल पसंद नहीं, कल वही महत्वपूर्ण हो सकते हैं. क्योंकि हमारी समझ हमेशा एक जैसी नहीं रहती है. हमारी समझ और हमारी सोचने की ताक़त और क्षमता हमारी धारणा बनाती है.

Sunday, October 11, 2009

सब कुछ हो गया - पर ये एक है कि अभी तक पकडा नहीं गया

The SamuraiImage via Wikipedia
ससुरे तालिबान बड़े जालिम लडाके हैं - बड़ी खतरनाक लड़ाई लड़ते हैं. अब अफगानिस्तान हो या पाकिस्तान का पेशावर - गजब जोखिम भरी लड़ाई लड़ रहे हैं. अब इनका खौफ कितना है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है - गत दिनों,  न्यूज़ आती है, कि काश्मीर में कुछ तालिबान लडाके घुस आये हैं - भारत सरकार की मिलिट्री के आकाओं को इसका खंडन करना पड़ता है,  कि नहीं ऐसा नहीं है. आतंकियों का मनोबल बढाने के लिए ये काफी था.

जब मैं इन तालिबान लडाकों को देखता हूँ, तो उनका ये गजब का जूनून मेरे को कुछ पुराने सिनेमा की याद दिलाता है. इनमें से आज के जमाने के कुछ सिनेमा हैं - The Last Samurai, Gladiator, troy  वगैरह वगैरह.. ये सारी सिनेमा में एक लडाका होता है, जो गजब का बहादुर होता है - बहुत लोगों को अकेले मौत के घाट उतार देता है. मैं सोच रहा था, कि शायद इन्हीं सब सिनेमा को देख के वो लोग इतने दिलेर बने हैं. वरना ज़रा सोचिये... पाकिस्तान के सेना के एक ब्रिगेडिअर और एक लेफ्टिनेंट कर्नल सहित कई सैनिको को उन्हीं की मांद में घुस के मार डालना और कुछ को बंधक बना लेना - जंगली आदिवासी टाइप के लडाकों की बस की बात नहीं थी.

अब पता नहीं किसकी गलती है, हो सकता है कि इसी तरह के कुछ सिनेमा शुरुवाती दौर में अमेरिकियों ने हालीवुड से ले आके तालिबानी ट्रेनिंग के वक़्त उनको दिखाया होगा (डिस्क्लैमेर - लोग कहते हैं कि तालिबान लोगों को बनाने में अंकल सैम का सहयोग हुआ करता था. मैं बहुत छोटा था उस वक़्त, कुछ बुजुर्ग जो इसे पढ़ रहे हैं, कृपया प्रकाश डालें. )

तो मैं ये सोच रहा हूँ, कि आखिर ससुर के नाती ये तालिबान कौन सी चक्की का आटा खाते हैं. या ऐसे पूछता हूँ, कि उधर पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा वाली घाटी में कौन सी फसल उगती है, कि लड़ने की इतनी ताक़त देती हैं. क्या मोटिवेशन है बाबा. वाह! वैज्ञानिकों को वहाँ की मिटटी की शोध करनी चाहिए.

अगर कारपोरेट जगत चाहे तो अपने executives को मैनेजमेंट ट्रेनिंग के लिए स्वाट घाटी भेज दे. जोखिम है - पर फायदा भी बहुत है. आखिर अर्सों से बस लड़े जा रहे हैं. पता नहीं क्या चाहते हैं. पर बस लगे हैं तो लगे हैं.. अगर लड़ाई बंद हो जाए तो ये लोग बैठे - बैठे यूं ही मर जायेंगे.. तो आखिर कुछ तो है. कुछ टी.वी. के प्रचार वाले भी इनसे अपने अगले प्रचार का आईडिया ले सकते हैं. जैसे - वगैरह - वगैरह खाइए - लगाइए - इस्तेमाल करिए और तालिबान जैसी प्रबल इच्छा-शक्ति और लगन और ताकत पाइए.

वैसे कुछ लोग हैं, जो इस महान लड़ाई के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं. मेरे भाई ने पुछा .. ये तालिबान लोग कौन है? अल-कायदा और तालिबान अलग - अलग हैं क्या? उसको ये जान के हैरानी हुई कि कई देश की सेना (NATO) मिल के वहाँ लड़ाई लड़ रही है, पर फिर भी वहाँ मामला हल नहीं हो रहा है. वैसे मेरी माता जी, जो कि आस्था चैनल के बाबा लोगों के अलावा अगर कोई दूसरा चेहरा पहचानती होंगी तो वो है.. ओसामा बिन लादेन का. ससुरा इतनी बार टी.वी वाले उसका चेहरा दिखाते हैं कि कहो मत. कहने लगीं .."सब कुछ हो गया - पर ये एक है कि अभी तक पकडा नहीं गया"

(अगर किसी देश की खुफिया एजेन्सी - इस को पढ़ रही है, तो कृपया गलत मतलब न निकालें - हमारा उन लोगों से कोई लेना देना नहीं है.. हम तो बस यूं ही टाइम पास कर रहे हैं...)

Monday, October 5, 2009

अच्छा ही है, कि श्रीलंका और पाकिस्तान में आपस में दुश्मनी नहीं है

Exocet missile in flight
आपको लगता होगा कि भारत को चीन से खतरा है, पाकिस्तान से खतरा है. पर मैं आपको आज एक अन्दर की बात बताता हूँ. किस्सा कुछ इस तरह है. कुछ दिनों पहले आपको याद होगा कि पाकिस्तान में श्रीलंका क्रिकेट खिलाडियों पे हमला हुआ था, और श्रीलंका के खिलाडी किसी तरह से बच गए थे. अंतरराष्ट्रीय महकमें में काफी हलचल मची थी. भारत में मीडिया ने इस घटना को बहुत ज्यादा हवा नहीं दी थी. पर असल में मामला काफी खराब हो गया था.


उधर श्रीलंका में खुफिया जानकारी के आधार पे पाकिस्तान को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था.

अच्छा ही है, कि श्रीलंका और पाकिस्तान में आपस में दुश्मनी नहीं है - और मामला वहीँ रफा दफा हो गया. फ़र्ज़ कीजिये श्रीलंका आक्रमण की तैयारी करता, तो क्या होता? अजी भाई जी, कुछ इस तरह हो गया होता..

श्रीलंका ने अपनी वो सारी मिसाइल निकाल ली जो कि लिट्टे से लड़ाई के बाद बची थी. अब लफडा ये था कि कोई भी मिसाइल की रेंज इतनी नहीं कि वो भारत को लांघते हुए पकिस्तान पे जा के गिरे. बड़ी भारी समस्या. भारत भी परेशान हो उठा. आप पूछेंगे - भारत का क्या जाता है - जिसको लड़ना है वो लड़े. अरे नहीं कक्का यहीं तुम धोखा खा गए. जरा सोचो - अगर श्रीलंका ने मिसाइल छोडी, तो वो तो भारत के ऊपर ही फुस्सी होगी न. तो भारत ने बीच-बचाव करना शुरू किया. सुरक्षा सलाहाकार समिति की बैठक में ये भी सलाह दिया गया की भारत देश को श्रीलंका की सहायता करनी चाहिए. वहीँ साउथ इंडिया के शांतिप्रिय प्रदेश घबरा गए. वरना अभी तक तो वो ये सोचते थे कि पाकिस्तान जितना भी हवा भर ले, इधर तक तो नहीं आयेगी उसकी मिसाइल. पर अब क्या होगा. न्यूज़ चैनल वालों ने चर्चा छेड़ दी - कि कर्नाटक, केरला, तमिलनाडु, सबसे सेफ कौन है. बस एक बार श्रीलंका की मिसाइल उनके प्रदेश के ऊपर से निकल जाए.

कुछ लोगों ने सलाह दी, कि भारत को कम से कम किराए पे अपना राकेट श्रीलंका को देना होगा. कि बम तो श्रीलंका का हो, पर किसी तरह से वो बम सुरक्षित तरीके से पकिस्तान में गिरे. पर लफडा ये कि, अंतर्राष्ट्रीय तबका इसकी मंजूरी देगा कि नहीं. आखिर कोई कानून तो ऐसा बनाना ही चाहिए कि अगर कोई देश दूर तक जाके लड़ना चाहता है, पर उसकी बम फेंकन ताकत उतनी नहीं है, तो दूसरे देश उसे कुछ राकेट किराए पे दे सकें. इसे मिसाइल हस्तांतरण के अर्न्तगत कतई ही नहीं देखा जाना चाहिए. आखिर एक देश को अपनी सेफ्टी वास्ते इतना तो करने ही देना चाहिए.

इन सबके बावजूद ... अगर पाकिस्तान और श्रीलंका के मिसाइल आपस में टकरायेंगे तो आखिर भारत के ही किसी शहर पे गिरेंगे. हे भगवान्.. भारत पूरी तरह से असुरक्षित. .. अगर पानी की लड़ाई हुई, तो श्रीलंका के जहाज इतने बड़े नहीं थे कि एक बार तेल भर के बिना भारत कि सीमा में प्रवेश किये बगैर पाकिस्तान से गोली बारी करें.

तो कुल ले दे के भारत के समझाने और भविष्य में मदद के आश्वासन देने के बाद और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हुआ.

Sunday, October 4, 2009

पहिये के बाद, दूसरा सबसे बड़ा आविष्कार..ईमेल

Settings: Setting Up Email AccountsImage by pouwerkerk via Flickr

पहिये के बाद, दूसरा सबसे बड़ा आविष्कार..ईमेल

जी ये न्यूयार्क टाईम्स की रिपोर्ट या फिर किसी नोबेल प्राइज़ विजेता की किताब के पन्नों से लिया गया वक्तव्य नहीं है.. ये पूर्णतया देशी पंचायतनामा की पेशकश है... जब हम पढ़ाई करते थे, तो एक बार माट्साब ने एक सवाल पूछा - कि बताओ, अभी तक की सबसे बड़ी खोज क्या है... बहुतों ने जबाब दिया.. हमने माट्साब के जबाब का इन्तेजार किया .. उन्होंने कहा.. 'पहिया'. तब तो मैं जबाब नहीं दे पाया था.. पर अभी मैं पूरी तरह से तैयार हूँ. कि अगर पहिया के बाद का कोई दूसरा सबसे बड़ा आविष्कार है, तो वो है ईमेल.

ईमेल एक ऍप्लिकेशन नहीं है, बल्कि, एक नशा है. हमें याद है - १९९९ में मैंने अपना पहला ईमेल आईडी बनाने का प्रयास किया था. कंप्यूटर की पढ़ाई थी और उसी की लैब क्लास थी. हमें अभी भी याद है, कि जब क्लास में सर ने पहली बार ईमेल क्या है और कैसे काम करता है, के बारे में बताया था.. तो जान कर बड़ी हैरानी हुई थी. फिर उन्होंने बड़ी ही अदा से अपने पर्स में से अपना विजिटिंग कार्ड निकाला और दिखाया कि उनका एक ईमेल आई-डी है. हम आगे बैठते थे और उन चंद खुशनसीबों में थे, जिन्होंने पहली बार कोई ईमेल आई-डी देखा था.


फिर लैब की क्लास में ऐसा मजमा लगा कि लोग पिल पड़े. http://www.yahoo.com/ जी हाँ, आज भी याद है, पूरा क्लास अगले ३ लैब क्लास्सेस में अपना ईमेल आई-डी बनाने में जुटा रहा. क्या लगन थी - हमारा भी पहला ईमेल-आई-डी तीन दिन के अथक प्रयास के बाद बना. कारण ये कि, १९९९ में एक तो स्लो इन्टरनेट कनेक्शन और उसमें पूरा क्लास एक ही वेबसाइट के पीछे पड़ा था.. भाई.. माट्साब ने कोई दूसरी वेबसाइट बताई ही नहीं, तो लोग खोलते कैसे.

थोड़े दिनों, के बाद जब थोड़ी और समझ आई, तो पहला सवाल मैंने ये पूछा (याद नहीं है कि किससे पूछा था ) कि भाई ये मेल में CC और BCC क्यो होता है. जबाब आया, कि अगर किसी का ईमेल आई-डी CC/BCC में रखेंगे तो वही मेल सारे लोगों को चली जायेगी. उस वक्त के मेरे ज्ञान के हिसाब से मेरे को ये बात बहुत ही अटपटी लगी.. कि ये क्या समझदारी की बात हुई, भला हम एक ही बात पहले तो कई लोगों से क्यों कहेंगे.. और अगर कहेंगे तो फिर TO में ही रख के भी तो कह सकते हैं, ये एक्स्ट्रा पंचायत करने की क्या जरूरत है. बहुत दिनों तक इसकी महिमा का पता नहीं चला.

फिर १ वर्ष की पढ़ाई के लिए बंगलोर आना हुआ.. वहां लोगों ने लैब में लाइनक्स (LINUX) रखा था. तो ईमेल की एक रेडीमेड सुविधा थी - नाम था उसका 'पाइन' (PINE). ये टेक्स्ट आधारित ईमेल प्रोग्राम था. क्या सुपर स्पीड थी.. वहीँ से नशा लगा ईमेल का तो अभी आज तक नहीं छूटा है. ईमेल - आई-डी (d0253102@ncb.ernet.in) बड़ी ही चिरकुट थी. पर क्या बला की स्पीड थी. लोग दो लाइन प्रोग्राम लिखते तो ४ बार बीच में मेल खोलते थे. शुरुवाती तीन महीने मानो काले पानी की सजा माफिक सिर्फ़ कीबोर्ड और काली स्क्रीन. न तो माउस दिया गया और न ही विन्डोज़..जब चौथे महीने विन्डोज़ के दर्शन हुए तो लगा कि स्वर्ग में आ गए हैं. पर फिर भी ईमेल का ये मजेदार दौर पूरे एक वर्ष चला. फिर वहीँ से नौकरी लग गई.. फिर ईमेल का सबसे रोचक दौर चालू हुआ.

अब ऑफिस की एक हमारे नाम की ख़ुद की ईमेल आई-डी थी. क्या सही लगा देख के. पहली बार मेरा फर्स्ट और लास्ट नेम पूरा लिखा था ईमेल आईडी में. जितनी बार देखो मन नहीं भरता था. आपको आश्चर्य हो रहा है. अरे कभी आपने मेरा दर्द देखा होता, तो न जानते.. जब मैंने अपने पहली ईमेल - आई-डी बनाई थी, तो तीन दिन के अथक प्रयास के बाद जो निकल के आई, कि उसमें 'नीरज' - की जगह मैंने 'नीरा_सिंग' से काम चलाया था. कितना दर्द होता था.. जब मैं नीरज से नीरा बना था.. तो मैं कह रहा था, कि बड़ा मुश्किल था कोई ऐसा ईमेल होना जिसमें आपका पूरा नाम आराम से आ जाए.. तो बड़ा सम्मान महसूस हुआ.. शायद उतना ही.. जितना हमारे माट्साब को किसी ज़माने में हुआ होगा, जब उन्होंने सारी क्लास के सामने अपना ईमेल आई-डी अंकित विजिटिंग कार्ड लहराया था..

जैसे जैसे दौर आगे बढ़ा.. लोगों का ईमेल का जूनून बढ़ता गया.. अब धीरे - धीरे मुझे CC/BCC का मतलब समझ में आने लगा. बाकी कुछ तो ऐसा समझ में आया, कि अगर CC/BCC न होता तो ऑफिस में लोग मेल कैसे करते. ऑफिस में बड़ा महत्व है कि आप किसको सीसी में रख के मेल करते हैं, उसी के हिसाब से मेल की वेलू घटती - बढ़ती रहती है. जैसे अगर आपने सीसी में बड़े ओहदे के साहब का ईमेल आई-डी दाल दिया तो मायने बदल जाया करते हैं. हमारे कितने बड़े बड़े ओहदे पे बैठे हुए लोग हैं, जो कि दिन भाई बस मेल के जरिये ही संवाद करते हैं और वही उनका सारा काम चलाता है.. ईमेल चला गया, तो वो बाकी अपनी जीविका कैसे चलाएंगे.. फिर ईमेल के अपने बहुत से फायदे हैं, वो आपको पता हैं.

बहुत जल्दी ही ईमेल ने हमारी दिनचर्या में एक अहम् जगह बना ली है. 

वो पुरानी 'सरिता' की कहानी का एक पन्ना

I've got a Monkey on my back.....Image by law_keven via Flickr
जय बजरंग बली ...और सब खतरे टल गए ...बजरंग बली पे याद आया एक मस्त किस्सा हुआ पिछले दिनों राज -राजेश्वरी नगर, बनारस में ...मेरे आगे वाले नए किरायेदार ने दरवाजा खुला छोड़ दिया तो एक बन्दर शाम को पहले किचेन में घुस गया तो जो लेडी है उन्होंने बच्चों को बेडरूम में बंद कर दिया और वेट करने लगी कि बन्दर बाहर निकल जाये.

थोडी देर में 20-25 बन्दर घर में घुस गए और उन्होंने भयानक उत्पात मचाया ...तोड़फोड़ की किचेन में ...

1 घंटे चला ये खेल ..किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि क्या करें ..कोई जेंट्स नहीं था - मम्मी ऊपर घर में और किरायेदार कमरे में बंद ...फिर लल्लन भैया के साले  साहेब जो सामने वाले आशु के मकान में रहते है उन्होंने हिम्मत की. डंडा लेकर घुमाया और घर में आकर सारे बंदरो को भगाया ....सच बहुत हिम्मत वाला काम था ...फिर बन्दर खीज कर, मम्मी ऊपर से झांक रही थी तो उन्हें काटने दौड़ा ..तो मम्मी किसी तरह दौड़ के बची ..इस तरह राज राजेश्वरी नगर में बंदरो का आतंक बढ़ता रहा.

बात ऐसे बनी - बच्चो के मुख से - दिन दहाड़े - वो पुरानी सरिता की कहानी का एक पन्ना -  (आभार - बंटी )
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