मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"


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Monday, July 22, 2024

संस्मरण

 

संस्मरण

बड़े जद्दोजहद के बाद, अत्याधुनिक तकनीकों का सहारा लेते हुए हमने 8 मई का अपॉइंटमेंट लिया कोविड वैक्सीनशन के लिए नरपतपुर सेंटर पे। गूगल से स्थान का रास्ता समझा और सुबह पेट भर नाश्ता कर के निकल पड़े विजय अभियान हेतु। 30-40 मिनट की मोटरसाइकिल यात्रा के बाद निर्धारित स्थान पर ठीक 10 बजे सुबह हाजिर हो गए।

पता चला कि वहां उस समय तक न वैक्सीन आई थी न वैक्सीन लगाने वाले। अपने आप को देश की राजधानी का वाशिन्दा मानते हुए, इस जगह के पिछड़ेपन का कारण लोगों की लापरवाही को बताते हुए मन ही मन बहुत कोसा उस अस्पताल से सिस्टम को।

अंततः 10:45 पर वैक्सीन आई और बेतरतीब ढंग से लंबी लाइन लग गई धक्का-मुक्की के साथ, क्योंकि एक घंटे में बहुत लोगों का जमावड़ा हो गया था वहां पे। वहां 2 कमरों में वैक्सीन लग रही थी। हम एक में गए जहां कम भीड़ थी, फटाफट वैक्सीन लगवाई और विजयी मुद्रा में बाहर निकल लिए, दूसरे कमरे की भीड़ में घुसे हुए लोगों को देख मुस्कुराते हुए।

अब सर्टिफिकेट की प्रतीक्षा थी जिसे मित्रों को दिखा के छोटी-मोटी जंग जितने का प्रमाण देकर फ़र्ज़ी वाहवाही लूटी जाए और बाकियों को वैक्सीन लगवाने के महत्व को बताया जाए। शाम ढली पर सर्टिफिकेट न आया। चिंता बढ़ी। तब तक SMS आया कि आपके मन कर दिए जाने के कारण आपका वैक्सीनशन न हो पाया श्रीमान। साला दिमाग भन्ना गया। गूगल से वहां के इंचार्ज का नंबर निकाल के उन्हें फ़ोन लगाया और बरस पड़े। फिर उनके रिस्पांस से समझ आया कि उन्हें तो कोई फर्क ही नहीं पड़ा। उल्टा उन्होंने नया ज्ञान पिलाया कि भाई आपने 45+ वाले कक्ष में टीकाकरण करवाया था इसलिए गलती आपकी।

आगे के बाकी वार्तालाप में मेरी तरफ से विनम्रता का अतिरिक्त पुट रहा। अंत में ये नया की अब मैं फिर से कोवैक्सिन का अपॉइंटमेंट उसी सेंटर पे लूं तब वे सर्टिफिकेट दे देंगे। वो दिन था और आज का दिन मैं लगातार देखता रहा लेकिन साला कोवैक्सिन रूठ गया और लगातार कोविशील्ड ही आता रहा वहां पे। थक-हार कर मैंने दूसरे सेंटर पे कोवैक्सिन की बुकिंग ली।

आज सुबह बालों में कंघी कर के वाहन पहुँचा और नर्स के वाहन से हटने की प्रतीक्षा करता रहा। जैसे वो हटी, मैंने ऑपरेटर को संक्षेप में अपनी समस्या बताई और उससे निवेदन किया कि वो बिना वैक्सीन लगाए उसमें कन्फर्म कर दे। बेचारा सज्जन व्यक्ति था और मान गया। इस प्रकार फुल्ली ऑटोमेटेड सिस्टम में 12 दिन के अथक प्रयास और सहज मानवीय संवेदना के परिणाम स्वरूप मैं प्रथम डोज़ का प्रमाणपत्र पा सका।

ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं। धन्यवाद।


आभार - मनीष सिंह (बब्बू भैया) की डायरी से (मई 2021)

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