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| Mr. S, Boarding School Teacher (Photo credit: Tidewater Muse) |
मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"
Monday, October 6, 2008
कहानी हमारे नंदलाल सर की
Sunday, October 5, 2008
भूलना अच्छा है
Image by Google Image Search via Flickr बहुत दिनों तक ये ही चलता रहा - फिर मैंने देखा कि मैं अपने दोस्तों का नाम भूल जाता हूँ, अब वो सेंटी हो जायेंगे. तो भगवान् ने एक जबरदस्त आईडिया सुझा दिया - अहा! अभी मैंने एक कामन नाम रख दिया अपने अगल बगल वालों का. जैसे - जब मैं पढ़ाई कर रहा था.. तो लगा बुलाने लोगों को - 'रमेश' कह के. अब ये निक नेम ऐसा प्रचलित हुआ मेरी मित्र मंडली में, कि न जाने कितने रमेश पैदा हो गए. मेरा काम हो गया.
फिर मैंने - एक और मुज्ला छोडा 'राजू' - अब कई राजू पैदा होने लगे. कि शामत आ गई - सालों ने मेरे को ही राजू कह के बुलाना शुरू कर दिया. चलो फिर काम हो गया. और इतने परिचित और अपरिचित लोगों के नाम को याद रखने से मैं बच गया.
अब आई नौकरी के वक्त की बात. यहाँ तो लोग हिन्दी में बात ही नहीं करते थे.. और मेरे को इलाकाई नाम ज्यादा पता नहीं थी.. कुछ भी रखता, नाम इतने बड़े - बड़े थे कि मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था. तो अब एक और रोचक नाम सूझा. 'बाबूलाल' ये नाम मेरे कुबिकल में इतना चर्चित और प्यार का नाम हो गया, कि अगर कोई भी वहां आ के बाबूलाल कह के संबोधित करेगा, तो एक साथ चार लोग घूम जाते थे - वाह! भाई वाह! एक तीर चार शिकार. मेरा काम आसान हो गया था. भगवान् सभी की मदद करते हैं.
फिर मैंने सोचा कि आख़िर ऐसा क्या है, कि ये याददाश्त का मेरे जीवन में इतना गहरा रिश्ता है. कुछ और सोचा .. फिर कुछ और सोचा तो पता चला की. ये भूलना एक वरदान है. वरना जिदगी आज इतनी आसान न होती. जरूर, हर चीज़ के पीछे कुछ न कुछ अच्छा छिपा होता है.
अगर इंसान सब कुछ याद रखे तो शायद एक क्षण भी जीना मुश्किल हो जायेगा. बहुत चीजें ऐसी होती हैं, जिनको भूल जाना ही अच्छा होता है. और आपकी भूलने की जितनी ही बेहतरीन ताकत होगी, आप उतने ही मस्त जीवन यापन करेंगे. अभी मैं समझ चुका हूँ. चाहे मेरे को जिंदगी में न जाने और कितने ही 'राजू', 'रमेश' और 'बाबूलाल' का सृजन करना पड़े, मैं पीछे नहीं हटूंगा. स्वस्थ जिंदगी के लिए ऐसे सौ नाम कुर्बान. सलाम जिंदगी.
जिसको फरक पड़ेगा वो जताएगा नहीं... और बाकी दुनिया शोक मनाएगी
Image via Flickr निर्मल - हाँ
सोहन - मान लो हम सभी मित्रों में अचानक एक दिन किसी की मृत्यु हो जाए, किसी और के लिए नहीं चलो मैं अपने लिए ही कहूं - तो क्या फर्क पड़ेगा हम सबको?
क्या हम वक्त निकाल के उसके बारे में सोचेंगे, कि कुछ गया पास से और नुक्सान हुआ, या फिर वक्त के साथ वही भाग-दौड़?
निर्मल - जिसको फरक पड़ेगा वो जताएगा नहीं... और बाकी दुनिया शोक मनाएगी...
सोहन - ह..हआ हा हा ह (ठहाके की आवाज ) ये सही और स्पष्ट था. अति उत्तम।
निर्मल -हाँ यार, यही होता है... अब तुम ही कितने लोगों के बारे में सोचते हो दिल से.. तो क्या उन लोगों और उनके रिश्तेदारों को पता चलता है.. नहीं.. ये सब दिल की बात है... भूल जाना... चर्चा न करना... ये सब एक तरफ़ है.. दूसरी तरफ़ है ... अपना मन.. जो इतनी आसानी से नहीं मानता है।
सोहन - क्या कोई ऐसा नुकसान तुम्हे लगता है जो कुछ बेहतर कर जाता है? या ये नुकसान ही कहलाता है
निर्मल - मेरा मानना है.. सब कुछ बराबर होता है.. .. अगर कहीं नुक्सान.. होता है.. तो कहीं कुछ सही होता है.. बस पूरी तस्वीर दिखनी चाहिए.. जैसे.. राम जी को वनवास हुआ.. दशरथ के लिए जिंदगी का सवाल हो गया ... पर दुनिया का कल्याण उसी में लिखा था....
सोहन- तुम मानते हो की नुक्सान होते रहना चाहिए।
निर्मल - इसको ऐसे देखो.... - अच्छा काम होते रहना चाहिए ...अब उसकी वजह से कुछ नुक्सान भी होता है.. तो कुछ नहीं किया जा सकता॥
सोहन - ओह! .. नुक्सान की कोई सीमा रुपरेखा नही होती?
निर्मल - सही
सोहन - हर व्यक्ति के लिए उसकी परिभाषा शायद अलग है।
निर्मल - हाँ. और एकदम होनी भी चाहिए।
सोहन - : इसीलिए मै जो कह रहा हूँ कि क्या नुक्सान हो तभी ज्यादा जान पाता है इंसान या बिना नुकसान के भी जीना अच्छा है. बेहतर क्या है?
निर्मल - असल में... बिना नुक्सान के जीना -- ऐसी कोई बात होती ही नहीं है... नफा - नुक्सान दोनों ही दो पहलू हैं जीवन के... साथ साथ चलेगे... पर जीवन में किसी की वजह से कुछ फरक नहीं आना चाहिए .
जैसे साँस लेते हैं हम.... नित्यक्रिया को जाते हैं... खाना खाते हैं.. बीमार पड़ते हैं.. उसी तरह से नुक्सान और फायदा भी बस एक चीज़ है....
सोहन - अगर ऐसा समझे तो जीवन में किसी की value ही नहीं कर सकते. कि उसके होने न होने से कोई फरक नही।
निर्मल - जीवन में उसकी value है.. पर अटैचमेंट (लगाव / जुडाव ) नहीं है.. हम उसको एक value की तरह नहीं बल्कि एक ईश्वरीय वरदान के रूप में देखते हैं.. न की खरीददार की तरह कि.. खो जाने.. या नुक्सान हो जाने से.. दुःख करें।
सोहन - हम्म ...खरीददार ... फ़िर क्यूँ हक जमाया जाए कही भी किसी पे?
निर्मल - एकदम सही समझा. इस जीवन चक्र में.. इश्वर ने कुछ पल हमें दिए.. हमने अपना भाग लिया और बिना स्वार्थ के.. उसको आगे दूसरों से बांटने के लिये आगे कर दिया...
सोहन - क्या ईश्वर के होने की वजह से सारी समस्या है? कि वो बैठ के सबके लिए समीकरण तैयार करता रहता है. शायद उस आदमी पे ज्यादा ट्रस्ट (भरोसा ) भी ठीक नही जिसे इश्वर कहते है,
कर्म ही पूजा है पर दिल भी तो है ...और वो हे डरता है हर बार
निर्मल - ' ईश्वर ' अगर तुम एक कर्मयोगी की नजर से देखो.. तो कुछ नहीं बल्कि एक 'रेफेरेंस' (reference) है, जिसे की हम सब अपनी -अपनी भाषा में कुछ समझते है.. उसके कुछ मायने हैं..और एक दूसरे को -- या फिर कई बार लोगों को समझने समझाने में काम आता है... रही बात दिल की... मैं कुछ नही कह सकता... सबका दिल अपना अपना है.. पर एक बात सही है.. की दिल भी वैसा होता है.. या बन जाता है.. जैसा हम उसको बना न चाहते हैं.. जैसा हम उसको समझाते हैं
सोहन - हम्म कुछ हद तक सही किंतु हम अलग एंगल से सोचते है लाइफ को. चलो पर अच्छा healthy discussion हुआ ये।
निर्मल - यह अलग एंगल (दृष्टिकोण) ही है.. जिसे मैं कहता हूँ की हमारा दिल और हम उसे कैसे समझाते हैं.. दिल हमारे अन्दर का एक आइना होता है - एक अलमारी माफिक.. जिसमें हम अपने लम्हों को संजों के रखते हैं.. बस जो रखेंगे... वही सोच बन जायेगी कुछ समय बाद.
Saturday, October 4, 2008
इसे कहते हैं पंचायत। देखें। कुछ उद्धरण
अध्याय 1
परसों तो कंपनी में जोइनिंग चल रही थ. कल छुट्टी थी ॥ सो टुडे इस माय फर्स्ट डे हियर। They are arranging for the laptop n stationary etc. तब तक मैं मेल चेक कर रहा हूँ किसी दूसरे के पीसी पे. धीरे ध्रीरे समझ में आएगा क्या माहौल है यहाँ पे. तुम लोग सुनाओ अपने updates -
बधाई हो दोस्त :-) अब लैपटॉप रहेगा तो better connectivity रहेगी.. welcome to the corporate world :-)
अबे पहले वो कारपोरेट वर्ल्ड से बाहर था क्या?????????????????
कारपोरेट एक सिनेमा है जिसमे बहुत कुछ दिखाया गया है ;-)
गुड question - पहले जनाब सरकारी थे
बस बाबा कारपोरेट जगत में ऐसे मस्त रहते हैं जैसे साधू चिलम लगा के अपनी लंगोट में
अध्याय 2
betterकोन्नेक्टिविटी के लिए घर पे भी नेट लेना पड़ेगा बाबा....ऑफिस में तो पुरानी कंपनी में भी गंध मचाते ही थे....नई जगह में ज्यादा नही नेतिया सकते...पुराने होते ही यहाँ भी दामाद बन जाएँगे - जय हो
इन्टरनेट एक अच्छी चीज है.. भले ही हफ्ते में एक दिन खाना कम करके महीने का ४००-५०० रूपया उसमे दे - जनहित में जरी एक ज्ञापन :-)
बंगलोर में भी इन्टरनेट के लिए अर्जी दे दी गई है... अब यही हमारा नारा है..."हर घर में हो एक इन्टरनेट कनेक्शन - सपना भारत देश किया..."
अध्याय 3
मैं भी एक केस स्टडी बन के रहूँगा.....मकान बुक करा के वैसे ही भुखमरी का शिकार होने वाले थे.....अब नेट वेट ले के रही सही कसार भी पूरी कर ली जाए....."एक लखपति की भुखमरी से मौत"
मकान लेना एक साहस भरा कदम था… हम सबका पूरा सहयोग है दोस्त….. नही होगी एक लखपति की मौत… अब तुम अम्बानी के आदमी हो…. और वो सब कुछ ठीक कर देंगे.. इन्टरनेट के लिए तो परेसान कभी मत होइयो… वो तो उनके बाबू किया सपना था… वो देख लेगा…
मकान - रहने के एक जगह...काश हम घर ले पते तो लखपति मरता भी तो गम नही होता..हर बार माकन हे बनव्वाते खरीदते रहे...अल्ल्ल्ल्लाह्छ... नोट - कृपया घर और माकन के अन्तर को दिल से समझे और सोचे!!
अध्याय 4
बब्बू to neeraj_at_gmail.com से chat करोगे? बोलो… साथ में फ्री में singh shailesh_AT_gmail.com bhi mil jaayega….
मानों... इंडिया टुडे की न्यूज़ के साथ दैनिक जागरण बनारस एडिशन फ्री
जनता आज फॉर्म में दिख रही है...जी परसन्न हो गवा
विश्व पंचायती सम्मलेन
*****
हम ही हम है तो क्या हम है तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो" क्या सोनू क्या रिंकू क्या बब्बू और फ़िर क्या बंटी
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पंचायत ख़त्म
Monday, September 29, 2008
भाग रे भाग, पुलिस
Image via Courtesey - www.boston.com वो तो आज उन लौंडों का दिन ख़राब था, की दरोगा जी अपने कारिंदों के साथ बगल में पुरानी चुंगी पे अपनी जीप किनारे लगा के चाय की चुस्कियां ले रहे थे. अब जीप धीरे -धीरे करीब आई और दो चार सिपाही उतरे और दो लोग दबोचा गए. वो बेवकूफ लोग सेंटी हो के आपस में ऐसे उलझे हुए थे कि उनको पता ही नहीं चला कि कब वो थाने पहुँच गए. अब बात मोहल्ले वालों से उनके घर वालों तक पहुँची. पुलिस में जाना अच्छा नहीं समझा जाता है. वैसे भी पुलिस के पास थाने में इतनी जगह नहीं होती कि वो लोगों को वहाँ ले जाए. दूसरी बात ये कि वो आम जनता को तकलीफ में नहीं डालना चाहती है. क्योंकि आम थाने की बनावट ऐसी होती है, कि उसमें हवालात के अन्दर और बाहर बाहर रहने में ज्यादा अन्तर नहीं होता है. और पुलिस में होकर वैसे ही वो परमानेंट सरकारी सजा भोग रहे होते हैं. अब जनता वहाँ जायेगी और उनकी हालत पे तरस खायेगी - ये उनको अच्छा नहीं लगेगा.
एक बार मैं अपनी रामप्यारी को सरपट दौड़ा रहा था, कि तभी मेरे को हाथ दिखा के रोक दिया गया. ये बंगलोर था और अपनी स्पीड नापने वाली मशीन से लैस नागरिकों की सुविधा के लिए तत्पर पुलिस फोर्स का एक दल था. जो दोपहर के वक्त अपने मिशन पे लगा हुआ था. मुझे गाड़ी किनारे खड़ी करने का निर्देश मिला और एक सिपाही ने तत्परता से मेरे गाड़ी की चाभी निकाल के अपने पास रख ली और मुझे उस मशीन की तरफ़ भेजा गया, जहाँ एक पुलिसवाला उस दूरबीन जैसे मशीन में कुछ तांक-झाँक कर रहा था. उसने कहा - 'देखो'. मैंने अपनी गर्दन अन्दर घुसाई तो दिखा की मेरी रामप्यारी जो कि 48 कि.मी. प्रति घंटे की रफ़्तार से मेरे को बैठा के रोड पे दौड़ रही थी - ये उसकी और मेरी तस्वीर थी. मेरे को बताया गया, की मैंने ४५ कि.मी. प्रति घंटे के ट्रैफिक नियम का उल्लंघन किया है. मैंने कहा सर - थोड़ा सा ही तो ज्यादा है.. प्लीज़ - पर बात न बनी तो मैंने ३०० रुपये सरकारी खाते में जमा करा के आगे बढ़ा. मैंने मन ही मन सोचा की वाह भाई.. क्या तत्परता है... बहुत जल्दी ही बंगलोर से सारी ट्रैफिक समस्या ख़त्म हो जायेगी. लोग बिना बात का ही पुलिस को दोष देते हैं.
अगर आपको हमारी पुलिस और उसकी दिलेरी पे संदेह हो तो आप - ये तस्वीर जरूर देखें. एक अकेला पुलिसवाला अकेले एक डंडा और एक ईंट का पत्थर लिए पूरी भीड़ का अकेले ही सामना कर रहा है - कोई शक ?
Sunday, September 28, 2008
मुंहपिल्लई
Image via Google Image Search 'शाबास!', मास्टर साब ने कहा, 'कम से कम तुम्हारी कोई अपनी राय तो है।' अपनी बड़ाई सुन के मेरा सीना गर्व से फूल गया. मास्टर साब ने क्लास में कुछ सवाल पुछा था और जब बहुत से बच्चों ने चुप रहना ही बेहतर समझा - मैं तपाक से बोल पड़ा था - यस सर........ ब्लाह ब्लाह .... और मास्टर साब ने बिना पूरा जबाब सुने ही, मुझे मेरी दिलेरी के लिए शाबासी दे दी. मुझे इस बात का कुछ तब ख़ास मतलब समझ में तो नहीं आया था - 'कम से कम तुम्हारी कोई अपनी राय तो है.' पर ये तो स्पस्ट था - अगर कुछ सवाल पुछा जाय तो जितना झट से हो सके आगे बढ़ - चढ़ के बोलना चाहिए. भले ही ये कहानी तब की है, जब मैं छोटे दर्जे में था , पर बात पते की थी और अन्दर तक घर कर गई थी.
क्लास ६ और ७ में हम लोगों की क्लास करीब एक महीने B.Ed. की मैडम लोग लिया करती थीं. ये उनका प्रैक्टिकल का टाइम होता था. क्लास के वक्त पीछे की बेंच पे उनकी सीनियर मैडम लोग आके बैठा करती थीं. वहीँ क्लास के वक्त ही वो हमारी मैडम लोगों का मूल्यांकन किया करती थीं . हम सारे क्लास के बच्चों को जो हमेशा फटा-फट जबाब दिया करते थे...उनको खूब पसंद किया जाता था. मैडम लोग पहले से समझा दिया करती थीं कि 'देखो!, आज तुम लोग शांत रहना और खूब सही से जबाब देना' - उस दिन मैडम कोई ऐसा चैप्टर पढाती थीं, जो वो पहले पढ़ा चुकी होती थीं. और उनके सवाल पूछने के साथ ही कई हाथ ऊपर खड़े हो जाते थे. सब एक से बढ़कर एक. मैडम भी किसी को निराश नहीं करती थीं. सबको भरपूर मौका दिया जाता था. सवाल वही, पर सबकी अपनी - अपनी राय होती थी और उसकी बड़ी क़द्र की जाती थी. 'वैरी गुड'!
- ये हमारा सिस्टम है, जिसने मेरे को मुंहपिल्लई करने वाला प्यारा इंसान बना दिया
- ये स्वयंभू पंचायत हर सप्ताह एक बार जरूर होती है। और हम दोस्त जी भर के मुंहपिल्लई करते हैं।
समय बीतता गया और ये आदत सी बन गई कि चाहे जो भी टोपिक हो, हमें अपनी राय तो रखनी ही होगी. अब वो चाहे वो घर का मसला हो, राजनीति का, सिनेमा का, या फिर ऑफिस से जुड़ी हुई कोई बात हो. अब बस यही गले कि हड्डी बन गई. अब ऐसी आदत सी हो गई है, कि न बोलो तो लगता है, कि गुरु जी का आशीर्वाद नहीं मिलेगा या मैडम जी गुस्सा हो जायेंगी. अब इसका खामियाजा मेरे अगल - बगल वाले भोग रहे हैं. अगर आप ये पढ़ रहे हैं, तो कृपया मेरी बात को समझने कि कोशिश कीजिये. ये हमारा सिस्टम है, जिसने मेरे को मुंहपिल्लई करने वाला प्यारा इंसान बना दिया.
मैं इन निम्न पंक्तियों का उल्लेख करना जरूरी समझता हूँ. क्योंकि इससे बल मिलता है, कि मैं अकेला ही नहीं हूँ. ये हैं राघवेन्द्र जी के लिखे एक पोस्ट से ली गई कुछ पंक्तियाँ
दरअसल ये स्वयंभू पंचायत हर सप्ताह एक बार जरूर होती है। और हम दोस्त जी भर के मुंहपिल्लई करते हैं। इस दौरान हर चीज पर चर्चा होती है - गाँव की पंचायत से लेकर बुश की नीतियों तक पर - गन्ने के खेत में होने वाले प्रेम प्रसंग से लकर हॉलीवुड की हीरोईनों पर.....हर तरह के क़िस्से...।
Saturday, September 27, 2008
क्षमा
| Pardon Us (Photo credit: Wikipedia) |
मेरी बात सुनकर 'क्षमा' ने मुस्कुराते हुए कहा - वाह! गुरु, मुझे गणित मत समझाओ. आख़िर मैं इतनी भी बेवकूफ नहीं हूँ. मैं तुम्हारा खाता देख के बता सकती हूँ, तुमने मेरे ('क्षमा') नाम पे न जाने कितनो को क्षमा किया है. और ज्यादातर समय तुमने बड़ी ही चालाकी से बिना सामने वाले को प्रकट किए ही मन ही मन उसको क्षमा कर दिया है. वाह! भाई वाह! तुमने ये काम न जाने कितनी बार, इतने सफाई से किया है, की किसी को कभी पता ही नहीं चला - और उसकी गिनती तुम्हारे हिसाब - किताब के बहीखाता में भी नहीं है.
और तुम क्या सोचते हो? की मैं बेवकूफ हूँ. तुम इस तरह से मेरे ('क्षमा') को दूसरों को दे के अपना खूब भला कर रहे हो. और मेरे को अपनी इमानदारी के किस्से सुना रहे हो. अपने मानसिक शांती का तुमने बड़ा ही बढियां तरीका खोज निकला है. आज मैं उसी सब का हिसाब किताब करने आई हूँ. अब मैं बुरी तरह फंस चुका था. अच्छा हुआ तभी मेरी नींद खुल गई. वरना आज तो 'क्षमा' से जीतना मुश्किल था.
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- Neeraj Singh
- Boston, MA, United States
- A software engineer by profession and in search of the very purpose of my life. At present, living in Bangalore and blog about my musings over technology, life, learnings and thinking mind.
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