मैं और मेरी पंचायत. चाहे ऑफिस हो, या हो घर हम पंचायत होते हर जगह देख सकते हैं. आइये आप भी इस पंचायत में शामिल होइए. जिदगी की यही छोटी-मोटी पंचायतें ही याद रह जाती हैं - वरना इस जिंदगी में और क्या रखा है. "ये फुर्सत एक रुकी हुई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, एक हरकत है एक जुम्बिश है - गुलजार"


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Tuesday, October 7, 2008

ये विद्रोह आख़िर है किसके ख़िलाफ़

मैंने बहुत से ब्लॉग पढ़े इधर बीच. ज्यादातर में तमाम तरह की समस्याओं की एक से बढ़कर चर्चा की गई थी. कोई राजनीति तो कोई देश की गरीबी, तो कोई देश की आबादी, और भी जाने क्या क्या. मैं नहीं सोच पाता हूँ इन सब चीज़ों के बारे में ज्यादा. शायद मैं सोचना ही नहीं चाहता हूँ. मैंने समाचारपत्र पढ़ना काफी समय पहले बंद कर दिया. फिर आया न्यूज़ चैनल का जमाना. ऐसी गंध मचाई इन लोगों ने की पूछो मत. मन उचाट हो गया. हर तरफ़ समाचार बेचा जा रहा था. मैं इस समाज में धीरे धीरे outdated होता जा रहा हूँ और मेरे को इसका एहसास भी नहीं हो पा रहा है.

सुन्दरता क्या होती है? मन सुंदर होना चाहिए. कभी भी किसी को बुरा नहीं कहना चाहिए. हमेशा लोगों के बारे में अच्छा सोचो. एक बात और है, जब तक इंसान जिन्दा रहता है, तब तक हम उसकी क़द्र नहीं जानते हैं. ज्यादातर समय हमारा उस कस्तूरी मृग की तरह बीतता है, जिसके बारे में कहा गया हैकस्तूरी कुण्डलि बसै, मृग ढूँढ़त वन माँहि जब तक जो सुख हमारे पास होता है, हम किसी और सुख की तलाश में रहते हैं, फिर कभी भविष्य को सुरक्षित करने में अपने वर्तमान के साथ बड़ा ही सौतेला व्यवाहर करते हैं. अक्सर ऐसा होता है, कि हम कभी अपनी नौकरी, तो कभी पारिवारिक कलह तो कंभी किसी और समस्या में उलझे रहते हैं बस कुछ कुछ चिंता लगी ही रही है. किसी ने सही कहा है, चिंता चिता समान है

सब कुछ जानते हैं, हम लोग. अगर किसी के साथ ये सब बातें करो, तो एक बहुत ही छोटा सा और सीधा सा सपाट जबाब आता है. पर उपदेश कुशल बहुतेरेसही भी है. पर आख़िर हल क्या है. अक्सर जो सत्य एकदम सहज होता है, उसको ही समझने में सबसे ज्यादा टाइम लगता है. किसी से पूछिए आपको वो बतायेगा, कि उसकी जिंदगी सबसे कठिन है. वो सब कुछ सही कर रहा है, पर पता नहीं क्यों उसके साथ एकदम उल्टा हो रहा है. बड़ी नाइंसाफी हो रही है. सब सहमत हैं इस बात से. सबको अपनी कहानी सही लगती है. तो मेरा सवाल ये है, कि अगर सब कुछ ऐसा ही उल्टा हो रहा है, तो भाई इसका हल क्या है. कुछ लोग कहेंगे, इसका कोई हल नहीं है. शायद वास्तव में बहुत से कष्ट होते हैं. जरूर होते होंगे. पर क्या ये सच नहीं है - कि हमें अपना कष्ट तभी तक बड़ा लगता है, जब तक हमको अपने से कहीं ज्यादा दुखी नहीं मिलते हैं, या हमें जब तक इसका एहसास नहीं होता है. ऐसा कोई जिसकी दिक्कतें हमसे ज्यादा बड़ी हैं. और वो हमसे भी ज्यादा दुखी जिंदगी जी रहा है. इस समय दो गाने याद आते हैं

औरों का गम देखा तो, अपना गम भूल गया

राही मनवा दुःख की चिंता क्यों सताती है, दुःख तो अपना साथी है 
सुख है एक छाँव, आती है जाती है, दुःख तो अपना साथी है.

पर क्या जरूरी है, कि हमको जब दुःख हो तब हमें कोई हमसे ज्यादा दुखी व्यक्ति मिल ही जाए. पर एक चीज तो आप कर ही सकते हैं. आज जो स्थिति में आप है, क्या ऐसा भी हो सकता था, कि इससे भी बुरा हुआ होता. बस एक बार कल्पना कर के देखिये. फिर ठंडे दिमाग से सोचिये. हो सकता है, आपके भाग्य में कुछ और भयानक होना लिखा था, पर इश्वर की कृपा से आज आप कहीं अच्छी हालत में हैं. पर होता क्या हैईश्वर के प्रति शुक्रगुजार होने के बजाय हम लोग एकदम विद्रोही हो जाते हैं. ख़ुद को भी नहीं पता होता है, कि ये विद्रोह आख़िर है किसके ख़िलाफ़. नजरिया बदलिए श्रीमान. किसी को और ख़ास कर अपने आप को माफ़ करना सीखिए. बहुत जरूरी है. वरना समस्याओं की तरफ़ देखेंगे तो बस आप गए. हमेशा दूसरे की जिंदगी दूर से बहुत ही हसीं लगती है. वास्तविकता ये है, कि रोज ऐसे जीइए कि आपको किसी से शिकायत हो. आख़िर जब ऊपर वाले की ही संतान हैं, और अगर सब वही करवा रहा है, तो फिर गम काहे का. बस लगे रहिये. लाइफ इस गुड.


  • लोग 10 सालों की खुशी की तुलना में 10 दिनों के दुःख में ज्यादा सीखते हैं।

  • अगर आप कहीं ग़लत हैं तो इसमें कम-से-कम एक बात अच्छी है - इससे दूसरों को बहुत खुशी मिलती है।

  • दुनिया के आधे लोगों को दुनिया के बाकी लोगों की परवाह नहीं है - इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस तरफ़ हैं।

Monday, October 6, 2008

कहानी हमारे नंदलाल सर की

Mr. S, Boarding School Teacher
Mr. S, Boarding School Teacher (Photo credit: Tidewater Muse)

एक माट्साब हुआ करते थे, नाम था उनका नंदलाल लाल सर. गुजरे जमाने की बात है, तब मैं छठीं / सातवीं में पढ़ा करता था. बड़ा ही डर लगा रहता था उनसे. रोज सोचता था, कि उनसे पाला न पड़े. पर रास्ता कट ही जाता था. फिर वो उन आतंकियों में से थे, जिन्हें स्कूल बहुत इज्जत से पालता है, क्योंकि वो स्कूल के अनुशासन के एक ऐसे मजबूत स्तम्भ हुआ करते हैं, जिनसे विद्यार्थियों का एक बड़ा तबका हमेशा सहमा रहता है.


अक्सर जो बच्चे हाँथ से निकलते प्रतीत होते थे, उनके माँ - बाप के लिए नंदलाल सर किसी आधुनिक द्रोणाचार्य से कम नहीं थे. नंदलाल सर से टयूशन लगवाओ और सफलता की गारंटी पाओ. मैं हमेशा ऐसे रहा कि - कभी मेरे घर वालों को उनकी सेवा लेने की जरूरत न पड़ जाए. उनका ट्रीटमेंट देने का अपना अनोखा अंदाज था. उनकी क्लास में सबसे ज्यादा शामत उन बच्चों की होती थे, जिन्हें सर जी घर जा के पढाया करते थे. क्लास में उन बच्चों से ज्यादा सवाल पूछे जाते थे. बच्चे हैरान. मास्टर खुश. और बाकी बच्चे भी खुश. क्योंकि, आरती (मास्टर साब का कहर ) भी ज्यादातर उन्ही मासूमों की उतरती थी जो उनसे घर पे पढ़ते थे. बड़ा ग़मगीन नजारा होता था. धूम -धांय - धिशूम - धिसूम -- मास्टर साब पे रंजीत और प्रेम चोपडा की पक्की छाप, ऐसा मैं पूरे विस्वास के साथ कह सकता हूँ.


मैं था एक आम व् साधारण विद्यार्थी, यानी एक बड़े झुंड का हिस्सा जिसमें छिपते-छिपाते आप दर्जे पे दर्जे पास किए जाते हैं, और किसी को पता ही नहीं चलता है. किसी भी स्कूल के किसी भी क्लास का एक बड़ा हिस्सा होने के बावजूद, उनको वो नाम और सम्मान नहीं प्राप्त होता. वो तो बस अति शरारती और कुशाग्र बुद्धि वाले बच्चों के ही हिस्से में आता है. और इनमें भी नाम कमाने के मामले में शरारती गोल कुशाग्र बन्दों से बाजी मार ही जाते हैं.


हाँ, तो मैं बता रहा था, कि आम विद्यार्थी स्कूल में अपनी क्लास में मास्टर की नजरों से बच के चुप चाप बैठता है. किसी को तंग करना, शैतानी करना उसकी फितरत में नहो होता है. शायद ये सब अच्छाइयां मेरे घर वालों को कम लगती थीं. यहीं से शुरू हुआ मेरी शांती में खलल. अरे यार डेली होम वर्क की कॉपी की जांच-पड़ताल. कौन सी कॉपी में साइन है, और कौन सी बिना साइन की. अब मैं छोटा सा बच्चा, कैसे कितनी कहानी सुना के अपने को कब तक बचाता. बस फरमान जारी हो गया. इसको टयूशन की जरूरत है. खोज जारी हो गई. मैं भगवान् से मनाता रहता, कि हे भगवान्, मेरे घरवालों को सदबुद्धी दें. पर नन्हीं सी जान की कौन सुनता है. अब मैं तो सोचता था, कि मैं ऐसे ही मस्त हूँ. पर नहीं, हमारे घरवालों को लगता था, लड़के में संभावनाएं हैं, इसको मौका दिया जाना चाहिए. अरे यार काहे का मौका, अभी घर में कम कुटाई होती है, जो अपने बच्चों को, एक बाहरी से पैसे दे के पिटवाओगे. राम राम. घोर कलजुग. अब बचना मुश्किल था.


तो हुआ यों कि मैं गया परचून की दूकान पे सामान लेने. जी हाँ, पवन जी के यहाँ से वो कुछ घर का सामान लेने गया था. अभी सड़क पार करने ही वाला था, कि मेरे को दिख गई नंदलाल सर की 'प्रिया' स्कूटर. वो पवन जी की दूकान पे थे. मैंने बिना वक्त गवाए वापस लौटना उचित समझा. अपने गुरु को दिया हुआ ये सम्मान मैंने जब आके अपने घर में बताया - तो बस यहीं मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी. घर में लोगों को ये भांपते समय नहीं लगा कि, मेरा ये मेरे गुरु जी के प्रति सम्मान आगे बहुत काम आएगा. बस बातचीत शुरू हो गई. अब ये तय था कि किसी भी तरह से नंदलाल सर को टयूशन के लिए तैयार करना है.


नंदलाल सर, नाटे कद के गोरी चिट्टे सामान्य शरीर के बनावट वाले इंसान थे. जी हाँ, इंसान. अब हर बच्चा उनको इस नजर से न देखे तो इसमें उनका क्या दोष. 'गोल्डी - इधर आओ, अपनी क्लास वर्क की कॉपी ले के आना' - जहाँ ये आवाज गूंजी, सारी क्लास में सांप सूंघ जाया करता था. अब तो गोल्डी भैया गए. अब चाहे कॉपी में काम पूरा हो या न हो - आज तो घन्टी बज गई. क्योंकि जब सर पढाते हैं, तो हर विषय की अपडेट रखते हैं. अब कुछ न कुछ तो बाकी रह ही जायेगा. और गोल्डी भइया पकड़ा गए. 'नहीं सर, नहीं ...... हो जायेगा सर, आगे से नहीं करेंगे.... नहीं सर. ....' पर कहाँ...


वैसे सर हमेशा डंडे या डस्टर से ही नहीं मारते थे. ज्यादातर उनकी दो उंगलियाँ ही उनका हथियार हुआ करती थीं. बात करते करते कमर के ऊपर पेट में जबरदस्त तरीके से उनकी दो उंगलियाँ एक मशीन की तरह चमडी को ऐसा उमेठती थीं, कि नानी न याद जाए तो मेरे ब्लॉग का नाम 'पंचायतनामा' नहीं. और अगर कभी माट्साब डंडा ले के क्लास में घुसे तो समझ लो आज सामूहिक धुलाई का दिन है. बिना भेद-भाव, पूर्ण भाई-चारे के साथ सभी पिटेंगे. माहौल हंसी का तब बन जाता था - जब सर आशीष को बुलाया करते थे.. नाम लेने के साथ ही, हरहरा के टेंसुयें बहना बहाना शुरू कर देता था.. छि... फिर कुछ सूरमा थे, कि सर की तरफ़ इतने धीरे गति से बढ़ते थे, और जैसे जैसे करीब आते थे, क्या आवाज निकालते थे, बिना छुए ही... नहीं सर मर जायेंगे.. माफ़ कर दीजिये...सर नहीईईन ........ पूरा नौटंकी. - पर माट्साब भी कहाँ छोड़ने वाले. अपनी सीट से उठ के सेवा करते थे.


तो जी, नंदलाल सर का पहला दिन था घर पे. मैं और मेरी बहन जो कि उस वक्त मेरे से तीन दर्जे छोटी कक्षा में पढ़ती थी, एकदम तैयार बैठे थे. घर वाले बहुत खुश. वाह! बाहर स्कूटर कि आवाज और दिल की धड़कन तेज. दरवाजा खोला - और मैंने कहा - 'सर नमस्ते' - भड़क गए सर एकदम. 'अपने से बड़े लोगों को नमस्ते करते हैं, यही तरीका है' मैं सर झुका कर सुन रहा था. सॉरी सर. 'ठीक है, आगे से ध्यान रखना - प्रणाम बोला जाता है' - फिर इसी के साथ ये सफर शुरू हुआ. पहले मेरे को भीड़ में से निकाल कर आगे की बेंच पे बैठाया गया. उनके डर से मैं हर सब्जेक्ट का काम एकदम बराबर तैयार रखता था. मास्टर साब को जल्दी ही पता लग गया कि, मैं स्पेशल केस नहीं हूँ, जिसे क्लास में घसीट - घसीट के मारा जाए. बस उनकी शक्ल ही काफी थी. वो भी बड़े खुश. घरवाले भी बड़े खुश, कि वाह! माट्साब ने तो जादू ही कर दिया है. वैसे मुझे तो नहीं याद कि उन्होंने पढाया क्या था. पर उनकी वजह से मैं पढ़ना सीख गया था. अब आगे बैठने से आशीष, सुधीर और कई तेज बच्चों के साथ दोस्ती होने लगी. कापी मिल जाया करती थी और मदद भी.


नंदलाल सर को घरवालों ने बताया - 'सर, ये आपको देख के भाग गया था', अब सर तो खुश हुए ही होंगे अपनी तारीफ सुन के. मैं सिर झुका के सुन रहा था. फिर बात आई, कि कुछ ऐसा किया जाए कि मेरा धड़का खुल जाए. आहा! मेरे को वैसे ही आगे की बेंच पे क्लास में बैठाए जाने के बाद से, मेरे शरीर के कई भाग वैसे ही खुल चुके थे. अब क्या बच्चे की जान ले के ही मानेगे. उसी समय गुरु जी का फरमान जारी हो गया - 'नीरज, तुम प्लेज तैयार करो, मैं तुमको असेम्बली में बुलाऊंगा - तुमको आना होगा और आ के जो प्रतिदिन की प्लेज (शपथ) का प्रोग्राम होता है, उसको तुम्हे करना होगा. यानी, पहली बात, मैं सारी प्लेज याद करून, फिर मंच पे जा के सारे स्कूल को लीड आवाज दूँ. जिंदगी में पहली बार मैंने क्लास १ में प्रयास किया था एक ४ लाइन कि कविता भी नहीं याद हो पाई थी. अन्तिम २ लाइन भूल कर वापस आ गया था. कविता थी.


ट्रिन ट्रिन बोला टेलीफोन
हमें बुलाता इसपर कौन
हैलो मैं हूँ राजू भइया,
मैं दफ्तर से बोल रहा हूँ,
प्यारा मित्र तुम्हारा जोंन

और ये थी स्कूल प्लेज. एक दिन हिन्दी में तो एक दिन अंगरेजी में होती थी.

"India is my country and all Indians are my brothers and sisters. I love my country and I am proud of its rich and varied heritage. I shall always strive to be worthy of it. I shall give respect to my parents, teachers and elders and treat everyone with courtesy. To my country and my people, I pledge my devotion. In their well being and prosperity alone, lies my happiness. Jai Hind!"

"भारत हमारा देश है हम सब भारतवासी भाई बहन हैं हमें अपना देश प्राणों से भी प्यारा है इसकी समृद्धि ओर विविध संस्कृति पर हमें गर्व है हम इसके सुयोग्य अधिकारी बनने का प्रयत्न सदा करते रहेंगे हम अपने माता-पिता, शिक्षकों एवं गुरुजनों का सदा आदर करेंगे और सबके साथ शिष्टता का व्यवहार करेंगे हम वनस्पतियों एवं जीव जंतुओं के प्रति दयावान रहेंगे हम अपने देश, और देशवासियों की प्रति वफादारी करने की प्रतिज्ञा करेंगे उनके कल्याण, और समृद्धि में ही, हमारा सुख निहीत है. जय हिंद! "

मेरी याददास्त शुरू से ही संघर्षशील रही है. और अब तो बड़े होके मैंने अपनी याददाश्त का रास्ता ही निकाल लिया है. लीजिये इसे पढ़ें, भूलना अच्छा है.. मैंने माट साब से दबी जबान में पुछा, 'सर, हिन्दी में या इंगलिश में.?' कड़ा जबाब आया, जो कि अपेक्षित था. 'दोनों में याद कर के रेडी रहो, मैं कभी भी बुला सकता हूँ.' अब अगर उन्होंने ये कहा होता - कि किस दिन बुलाएँगे, तो मैं उसी हिसाब से गणित कर के एक ही किसी भाषा में तैयार रखता. पर अब दोनों में तैयार रखना था - और वो भी जब तक कि माट्साब बुला के संतोष न प्राप्त कर लें, तब तक रोज धुक-धुकि बनी रहती थी. आख़िर एक दिन नम्बर आ ही गया. बकरे की मान कब तक खैर मनाती. बस खुदा का शुक्र था, कि उस दिन जबान नहीं लडखडाई - वरना वहीँ सबके सामने मेरा हैप्पी बड्डे कर देते सर.

अभी हमारी कहानी धीरे धीरे आगे बढ़ ही रही थी. मेरा ही दिल जानता था - कि क्या हो रहा है. तभी, आशीष, जो अब तक मेरा दोस्त हो चुका था, उसने मुझे एक दिन एक आमंत्रण दिया. जब क्लास के अच्छे बच्चे कोई बात करते हैं, तो अच्छी ही होती है. ये निमंत्रण था अभिनय का प्रेमचंद के लिखे एक नाटक में. कहानी का नाम था 'मंत्र'. इस नाटक के पात्रों का चयन हो चुका था, बस एक - दो की कमी थी. और आशीष को मुझसे अच्छा बकरा नहीं मिला. मैंने अपने स्वभाव अनुसार - इस निमंत्रण को प्रेम पूर्वक अस्वीकार कर दिया. कारण - एक तो स्टेज फीयर और दूसरा ऐसा कोई शौक न होना. पर आशीष जबरदस्ती पीछे पड़ा ही था. नहीं .. नहीं .. तुमको करना है.. संजय को उसने पहले ही तैयार कर लिया था. संजय भी हमारे साथ पढता था. मैं बहुत देर तक ठहर नहीं पाया. क्योंकि मेरे को डर था, कि अगर नंदलाल सर तक बात पहुँची तो, बस उनका वीटो आते ज्यादा देर नहीं लगेगी. ३६ सवाल और पूछे जायेंगे. आख़िर अब मेरे पास और कोई चारा नहीं था.

बस उस नाटक और उसमें अपने अभिनय के बारे में कभी और लिखूंगा. बस इतना बता दूँ, पूरे एक महीने चली रीहर्शल में मेरा और संजय का आपस में बातचीत करते हुए स्टेज के एक कोने से चलते हुए दूसरे कोने में निकल जाना था.

संजय का संवाद था - अरे भाई चड्ढा बाबु का तो घर ही उजाड़ गया.

मेरा संवाद था - हाँ भाई, सुना है, वही तो एक लड़का था.

आशीष लाल तो नायक थे. एक घंटे तक चलने वाली रीहर्शल में मैं बस अपनी इन लाइनों को बोलने के लिए इन्तेजार करता रहता था. आज भी मैं चड्ढा बाबु को भूल नहीं पाया हूँ.

तो इस प्रकार भय की वजह से - मेरा अभिनय के क्षेत्र में ये छोटा किंतु पहला कदम था.

अभी सब कुछ ऐसे ही चलता. पर एक दिन नंदलाल सर ने हमारी छोटी बहन की किसी बात पे पिटाई कर दी. और उसने जो रोना मचाया कि बस अगले दिन घर में मीटिंग बैठ गई. और फैसला लिया गया कि अगले दिन मास्टर साब से इसकी शिकायत दर्ज होगी. माताजी ने अगले दिन माट्साब की क्लास ली. पिताजी का पूरा सहयोग था. हमारे सर जी ने बात सुनी. फिर अगले दिन वो आए, और उन्होंने कहा - 'तुम समय पे काम नहीं करते हो, जो मैंने कल काम दिया था वो पूरा नहीं है. मैं ऐसे नहीं पढ़ा सकता' और बस उठे और उठ के चल दिए. हम भाई - बहन को तो एकदम सांप सूंघ गया. लगा, कि इसके जिम्मेदार हम ही माने जायेंगे और घरवाले बोनस धुलाई करेंगे. पर भगवान् का शुक्रिया था - हम समझदार न थे पर घरवाले जानते थे. उन्होंने हम बच्चो को समझाया - 'बेटा, इसमें तुम्हारी गलती नहीं है' ... वो माट्साब जान गए थे कि अनायास मारपीट का उनका फार्मूला यहाँ नहीं चलेगा. बस ३ महीने ही हम उनके चेले रह सके.

वो सब तो ठीक था, पर अभी तो अर्ध-वार्षिक परीक्षा सर पे आ गई थी. किसी तरह पिताजी ने एक मास्टर साब की व्यवस्था की. वो स्टेशन मास्टर थे.. पर बिना पिटाई किए पढाते थे. हमारे अच्छे नम्बर आए अपनी कक्षा में . फिर वार्षिक परीक्षा में भी अच्छे नम्बर आए. तो एक दिन नंदलाल सर ने क्लास के सामने मेरे को बुला के कहा - देख रहे हो इसे - इसकी क्लास में पोसिशन आई है - क्यों? मालूम है, क्योंकि इसको मैंने पढाया है.

अब कोई चाहे जो भी कहे. मेरे लिए तो वो ३ महीने काफी मायने रखते हैं. मैं आज वास्तव में अगर अपनी कक्षा में एक अच्छे बच्चों में गिना जाने लगा था, तो उसमें जरूर ही नंदलाल सर और मेरे घरवाले, मेरे माता - पिता की दूरदर्शिता थी. तब नहीं समझ आता है. पर आज पीछे मुड के देखता हूँ, तो सब समझ में आता है, कि यही चंद महीने, घंटे आपकी जिंदगी को नई दिशा देने के लिए काफी होते हैं. आज भी मैं जब किसी बड़े से मिलता हूँ, खासकर अपने गुरूजी लोगों से तो कभी सोते हुए, गलती से भी - नमस्ते नहीं, सिर्फ़ प्रणाम करता हूँ.

Sunday, October 5, 2008

भूलना अच्छा है

MemoryImage by Google Image Search via Flickr
बस अब और नहीं बर्दाश्त होता कि कोई कहे की मेरी याददाश्त कमजोर है. अरे यार, ठीक है, पर किसी को पता तो नहीं न चलता है. मैं किसी तरह manage कर ले रहा हूँ न. अपने को दिलासा देने के लिए ये बातें करते - करते कई बार समझ में नहीं आता था. कि क्या करे आदमी. अब सिंकारा पीने से तो याददाश्त वापस नहीं आ जायेगी. भाई, थोड़ा भूल ही तो जाते हैं, कोई एकदम ही थोड़े ही न चली गई है, मूई याददाश्त.
बहुत दिनों तक ये ही चलता रहा - फिर मैंने देखा कि मैं अपने दोस्तों का नाम भूल जाता हूँ, अब वो सेंटी हो जायेंगे. तो भगवान् ने एक जबरदस्त आईडिया सुझा दिया - अहा! अभी मैंने एक कामन नाम रख दिया अपने अगल बगल वालों का. जैसे - जब मैं पढ़ाई कर रहा था.. तो लगा बुलाने लोगों को - 'रमेश' कह के. अब ये निक नेम ऐसा प्रचलित हुआ मेरी मित्र मंडली में, कि न जाने कितने रमेश पैदा हो गए. मेरा काम हो गया.

फिर मैंने - एक और मुज्ला छोडा 'राजू' - अब कई राजू पैदा होने लगे. कि शामत आ गई - सालों ने मेरे को ही राजू कह के बुलाना शुरू कर दिया. चलो फिर काम हो गया. और इतने परिचित और अपरिचित लोगों के नाम को याद रखने से मैं बच गया.

अब आई नौकरी के वक्त की बात. यहाँ तो लोग हिन्दी में बात ही नहीं करते थे.. और मेरे को इलाकाई नाम ज्यादा पता नहीं थी.. कुछ भी रखता, नाम इतने बड़े - बड़े थे कि मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था. तो अब एक और रोचक नाम सूझा. 'बाबूलाल' ये नाम मेरे कुबिकल में इतना चर्चित और प्यार का नाम हो गया, कि अगर कोई भी वहां आ के बाबूलाल कह के संबोधित करेगा, तो एक साथ चार लोग घूम जाते थे - वाह! भाई वाह! एक तीर चार शिकार. मेरा काम आसान हो गया था. भगवान् सभी की मदद करते हैं.

फिर मैंने सोचा कि आख़िर ऐसा क्या है, कि ये याददाश्त का मेरे जीवन में इतना गहरा रिश्ता है. कुछ और सोचा .. फिर कुछ और सोचा तो पता चला की. ये भूलना एक वरदान है. वरना जिदगी आज इतनी आसान न होती. जरूर, हर चीज़ के पीछे कुछ न कुछ अच्छा छिपा होता है.

अगर इंसान सब कुछ याद रखे तो शायद एक क्षण भी जीना मुश्किल हो जायेगा. बहुत चीजें ऐसी होती हैं, जिनको भूल जाना ही अच्छा होता है. और आपकी भूलने की जितनी ही बेहतरीन ताकत होगी, आप उतने ही मस्त जीवन यापन करेंगे. अभी मैं समझ चुका हूँ. चाहे मेरे को जिंदगी में न जाने और कितने ही 'राजू', 'रमेश' और 'बाबूलाल' का सृजन करना पड़े, मैं पीछे नहीं हटूंगा. स्वस्थ जिंदगी के लिए ऐसे सौ नाम कुर्बान. सलाम जिंदगी.

जिसको फरक पड़ेगा वो जताएगा नहीं... और बाकी दुनिया शोक मनाएगी

two friendsImage via Flickr
सोहन - एक अजीब सी बात करें।

निर्मल - हाँ

सोहन - मान लो हम सभी मित्रों में अचानक एक दिन किसी की मृत्यु हो जाए, किसी और के लिए नहीं चलो मैं अपने लिए ही कहूं - तो क्या फर्क पड़ेगा हम सबको?

क्या हम वक्त निकाल के उसके बारे में सोचेंगे, कि कुछ गया पास से और नुक्सान हुआ, या फिर वक्त के साथ वही भाग-दौड़?

निर्मल - जिसको फरक पड़ेगा वो जताएगा नहीं... और बाकी दुनिया शोक मनाएगी...

सोहन - ह..हआ हा हा ह (ठहाके की आवाज ) ये सही और स्पष्ट था. अति उत्तम।

निर्मल -हाँ यार, यही होता है... अब तुम ही कितने लोगों के बारे में सोचते हो दिल से.. तो क्या उन लोगों और उनके रिश्तेदारों को पता चलता है.. नहीं.. ये सब दिल की बात है... भूल जाना... चर्चा न करना... ये सब एक तरफ़ है.. दूसरी तरफ़ है ... अपना मन.. जो इतनी आसानी से नहीं मानता है।

सोहन - क्या कोई ऐसा नुकसान तुम्हे लगता है जो कुछ बेहतर कर जाता है? या ये नुकसान ही कहलाता है

निर्मल - मेरा मानना है.. सब कुछ बराबर होता है.. .. अगर कहीं नुक्सान.. होता है.. तो कहीं कुछ सही होता है.. बस पूरी तस्वीर दिखनी चाहिए.. जैसे.. राम जी को वनवास हुआ.. दशरथ के लिए जिंदगी का सवाल हो गया ... पर दुनिया का कल्याण उसी में लिखा था....

सोहन- तुम मानते हो की नुक्सान होते रहना चाहिए।

निर्मल - इसको ऐसे देखो.... - अच्छा काम होते रहना चाहिए ...अब उसकी वजह से कुछ नुक्सान भी होता है.. तो कुछ नहीं किया जा सकता॥

सोहन - ओह! .. नुक्सान की कोई सीमा रुपरेखा नही होती?

निर्मल - सही

सोहन - हर व्यक्ति के लिए उसकी परिभाषा शायद अलग है।

निर्मल - हाँ. और एकदम होनी भी चाहिए।

सोहन - : इसीलिए मै जो कह रहा हूँ कि क्या नुक्सान हो तभी ज्यादा जान पाता है इंसान या बिना नुकसान के भी जीना अच्छा है. बेहतर क्या है?

निर्मल - असल में... बिना नुक्सान के जीना -- ऐसी कोई बात होती ही नहीं है... नफा - नुक्सान दोनों ही दो पहलू हैं जीवन के... साथ साथ चलेगे... पर जीवन में किसी की वजह से कुछ फरक नहीं आना चाहिए .

जैसे साँस लेते हैं हम.... नित्यक्रिया को जाते हैं... खाना खाते हैं.. बीमार पड़ते हैं.. उसी तरह से नुक्सान और फायदा भी बस एक चीज़ है....

सोहन - अगर ऐसा समझे तो जीवन में किसी की value ही नहीं कर सकते. कि उसके होने न होने से कोई फरक नही।

निर्मल - जीवन में उसकी value है.. पर अटैचमेंट (लगाव / जुडाव ) नहीं है.. हम उसको एक value की तरह नहीं बल्कि एक ईश्वरीय वरदान के रूप में देखते हैं.. न की खरीददार की तरह कि.. खो जाने.. या नुक्सान हो जाने से.. दुःख करें।

सोहन - हम्म ...खरीददार ... फ़िर क्यूँ हक जमाया जाए कही भी किसी पे?

निर्मल - एकदम सही समझा. इस जीवन चक्र में.. इश्वर ने कुछ पल हमें दिए.. हमने अपना भाग लिया और बिना स्वार्थ के.. उसको आगे दूसरों से बांटने के लिये आगे कर दिया...

सोहन - क्या ईश्वर के होने की वजह से सारी समस्या है? कि वो बैठ के सबके लिए समीकरण तैयार करता रहता है. शायद उस आदमी पे ज्यादा ट्रस्ट (भरोसा ) भी ठीक नही जिसे इश्वर कहते है,
कर्म ही पूजा है पर दिल भी तो है ...और वो हे डरता है हर बार

निर्मल - ' ईश्वर ' अगर तुम एक कर्मयोगी की नजर से देखो.. तो कुछ नहीं बल्कि एक 'रेफेरेंस' (reference) है, जिसे की हम सब अपनी -अपनी भाषा में कुछ समझते है.. उसके कुछ मायने हैं..और एक दूसरे को -- या फिर कई बार लोगों को समझने समझाने में काम आता है... रही बात दिल की... मैं कुछ नही कह सकता... सबका दिल अपना अपना है.. पर एक बात सही है.. की दिल भी वैसा होता है.. या बन जाता है.. जैसा हम उसको बना न चाहते हैं.. जैसा हम उसको समझाते हैं

सोहन - हम्म कुछ हद तक सही किंतु हम अलग एंगल से सोचते है लाइफ को. चलो पर अच्छा healthy discussion हुआ ये।

निर्मल - यह अलग एंगल (दृष्टिकोण) ही है.. जिसे मैं कहता हूँ की हमारा दिल और हम उसे कैसे समझाते हैं.. दिल हमारे अन्दर का एक आइना होता है - एक अलमारी माफिक.. जिसमें हम अपने लम्हों को संजों के रखते हैं.. बस जो रखेंगे... वही सोच बन जायेगी कुछ समय बाद.



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Saturday, October 4, 2008

इसे कहते हैं पंचायत। देखें। कुछ उद्धरण

HMS MARNE secured to a buoyImage via Wikipedia
इसे कहते हैं पंचायत। देखें। कुछ उद्धरण


अध्याय 1

परसों तो कंपनी में जोइनिंग चल रही थ. कल छुट्टी थी ॥ सो टुडे इस माय फर्स्ट डे हियर। They are arranging for the laptop n stationary etc. तब तक मैं मेल चेक कर रहा हूँ किसी दूसरे के पीसी पे. धीरे ध्रीरे समझ में आएगा क्या माहौल है यहाँ पे. तुम लोग सुनाओ अपने updates -


बधाई हो दोस्त :-) अब लैपटॉप रहेगा तो better connectivity रहेगी.. welcome to the corporate world :-)


अबे पहले वो कारपोरेट वर्ल्ड से बाहर था क्या?????????????????


कारपोरेट एक सिनेमा है जिसमे बहुत कुछ दिखाया गया है ;-)


गुड question - पहले जनाब सरकारी थे


बस बाबा कारपोरेट जगत में ऐसे मस्त रहते हैं जैसे साधू चिलम लगा के अपनी लंगोट में


अध्याय 2
betterकोन्नेक्टिविटी के लिए घर पे भी नेट लेना पड़ेगा बाबा....ऑफिस में तो पुरानी कंपनी में भी गंध मचाते ही थे....नई जगह में ज्यादा नही नेतिया सकते...पुराने होते ही यहाँ भी दामाद बन जाएँगे - जय हो



इन्टरनेट एक अच्छी चीज है.. भले ही हफ्ते में एक दिन खाना कम करके महीने का ४००-५०० रूपया उसमे दे - जनहित में जरी एक ज्ञापन :-)


बंगलोर में भी इन्टरनेट के लिए अर्जी दे दी गई है... अब यही हमारा नारा है..."हर घर में हो एक इन्टरनेट कनेक्शन - सपना भारत देश किया..."


अध्याय 3
मैं भी एक केस स्टडी बन के रहूँगा.....मकान बुक करा के वैसे ही भुखमरी का शिकार होने वाले थे.....अब नेट वेट ले के रही सही कसार भी पूरी कर ली जाए....."एक लखपति की भुखमरी से मौत"


मकान लेना एक साहस भरा कदम था… हम सबका पूरा सहयोग है दोस्त….. नही होगी एक लखपति की मौत… अब तुम अम्बानी के आदमी हो…. और वो सब कुछ ठीक कर देंगे.. इन्टरनेट के लिए तो परेसान कभी मत होइयो… वो तो उनके बाबू किया सपना था… वो देख लेगा…


मकान - रहने के एक जगह...काश हम घर ले पते तो लखपति मरता भी तो गम नही होता..हर बार माकन हे बनव्वाते खरीदते रहे...अल्ल्ल्ल्लाह्छ... नोट - कृपया घर और माकन के अन्तर को दिल से समझे और सोचे!!


अध्याय 4

बब्बू
to neeraj_at_gmail.com से chat करोगे? बोलो… साथ में फ्री में singh shailesh_AT_gmail.com bhi mil jaayega….

मानों... इंडिया टुडे की न्यूज़ के साथ दैनिक जागरण बनारस एडिशन फ्री


जनता आज फॉर्म में दिख रही है...जी परसन्न हो गवा


विश्व पंचायती सम्मलेन



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उनके देखे से जो आजाती है चेहरे पे रौनक वो समझते है के बीमार का हाल अच्छा है ...!!


हम ही हम है तो क्या हम है तुम ही तुम हो तो क्या तुम हो" क्या सोनू क्या रिंकू क्या बब्बू और फ़िर क्या बंटी

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पंचायत ख़त्म
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